अंजुरी के पापा ने भी इस बात पर सहमति जाता दी थी कि दो दिन पूर्व सभी की तरह अंजुरी और उसकी माँ को जाना चाहिए ताकि ,परीक्षा केंद्र से भी परिचय हो जाये ,कितनी दूरी है ,परीक्षा केंद्र तक जाना कितना आसान या कितना कठिन है। डाक बंगले के कर्मचारियों से परिचय ,खाने की क्या व्यवस्था होगी इत्यादि। उन्होंने कहा कि वे कल सुबह स्वयं ही जाकर उन्हें पहुंचा देंगे। उन्होंने ड्राइवर रघुनाथ से भी विस्तार से कह दिया था डाक बंगले और परीक्षा केंद्र जाने के लिए। तथा कल सुबह जल्दी आने के लिएभी कह दिया था। मम्मी ने उनके और अंजुरी के कपडे और किताबे अंजुरी से पूछ पूछ कर पैक कर लिए। दूसरे दिन सुबह सभी अलार्म लगा कर उठे और जल्दी ही तैयार होकर निकल पड़े। दस बजे वो डाक बंगले के मार्ग पर थे तभी ड्राइवर ने उन्हें महिला महाविद्यालय दिखा दिया ,इस प्रकार पहले उन्होंने परीक्षा केंद्र ही देख लिया ,वह डाक बंगले से मात्र दस मिनिट के पैदल रास्ते पर स्थित था। अंजुरी और मम्मी दोनों ही साफ़ सुथरे कमरे और बाथरूम्स देख कर प्रसन्न हुई। एक मात्र कर्मचारी रमेश ही वहां का इंचार्ज था ,लेकिन सफाई से लेकर खाना बनाने तक चुस्त फुर्तीला एवं निष्णात था,इसका अंदाज़ इसी बात से हो गया था कि ,उसने तुरत फुरत कमरों में बिस्तर ठीक कर दिए ,सामान लगा दिया और चाय नाश्ता भी बना दिया। अनमोल ठाकुर संतुष्ट हो गए उसे हिदायतें दे दीं और अंजुरी को परीक्षाओं के लिए शुभ कामना कह कर लौट गए।
अंजुरी उसी समय से पढ़ने को बैठ गई मम्मी किचन में जाकर रमेश से बातचीत करने लगी। अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर नहा धो कर, भगवान को हाथ जोड़ ,मम्मी के पैर छू कर ,पेपर देने निकली। उसका पेपर काफी अच्छा हुआ था। वह निकल कर डाक बंगले की ओर तेजी से निकल पडी। अनजानी जगह पर वह जल्दी से सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना चाहती थी।
उधर कमलेश्वर को भी पापा ने ही कार से पहुंचा दिया था। दीनू को वे अक्सर थोड़े लम्बे ड्राइव के समय बुला लिया करते थे। कमलेश्वर पीछे की सीट पर पढता रहा ,पापा आगे बैठे थे। भारत सिंह शेखावत के यहाँ कोई संतान नहीं थी। कमलेश्वर को अच्छा साफ़ सुथरा कमरा रहने के लिए मिल गया था। वह अपनी अलार्म घडी ले आया था। उसका परीक्षा केंद्र भी पास ही था और उसका पेपर भी बहुत अच्छा हुआ था। अगले पंद्रह दिन इसी तरह गुज़रे, एक दूसरे से दूर लेकिन एक दूसरे की स्मृतियों में ---क्रमशः
अंजुरी उसी समय से पढ़ने को बैठ गई मम्मी किचन में जाकर रमेश से बातचीत करने लगी। अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर नहा धो कर, भगवान को हाथ जोड़ ,मम्मी के पैर छू कर ,पेपर देने निकली। उसका पेपर काफी अच्छा हुआ था। वह निकल कर डाक बंगले की ओर तेजी से निकल पडी। अनजानी जगह पर वह जल्दी से सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना चाहती थी।
उधर कमलेश्वर को भी पापा ने ही कार से पहुंचा दिया था। दीनू को वे अक्सर थोड़े लम्बे ड्राइव के समय बुला लिया करते थे। कमलेश्वर पीछे की सीट पर पढता रहा ,पापा आगे बैठे थे। भारत सिंह शेखावत के यहाँ कोई संतान नहीं थी। कमलेश्वर को अच्छा साफ़ सुथरा कमरा रहने के लिए मिल गया था। वह अपनी अलार्म घडी ले आया था। उसका परीक्षा केंद्र भी पास ही था और उसका पेपर भी बहुत अच्छा हुआ था। अगले पंद्रह दिन इसी तरह गुज़रे, एक दूसरे से दूर लेकिन एक दूसरे की स्मृतियों में ---क्रमशः
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