कमलेश्वर ने बहुत चाहा था कि परीक्षाओं के बीच बीच के अवकाश में वह अंजुरी से मिल पाता या उसकी एक झलक ही देख पाता ,लेकिन अंजुरी ने इसके लिए उसे कठोरता से ना बोल दी थी। और यह अंतराल काफी लम्बा ही हो जाना था क्यूंकि परीक्षाओं के बाद छुट्टियां थीं और अंजुरी को पता भी नहीं था कि ,पापा ने उसका और उसकी मम्मी का नानी के घर जाने का रिजर्वेशन करा दिया था। जब वह परीक्षा देकर वापस लौटी तो उसे पता चला कि ,तुरंत ही उसे नानी के घर जाने के लिए सामान पैक करना है। वह आश्चर्य चकित रह गई। उसे नानी के घर जाना और रहना हमेशा से अच्छा लगता था ,पापा उसे सरप्राइज़ देना चाहते थे ,और इस बार वह वास्तव में ही सरप्राइज़ रह गई थी। दूसरे ही दिन वह और मम्मी वापस रेलवे स्टेशन पहुंचा दिए गए जीप के द्वारा, इस बार पापा नहीं आ पाए थे। सही समय पर ट्रैन आयी और अंजुरी अपनी नानी के घर की ओर चल दी।
उसे इस बात से बड़ी बेचैनी लग रही थी कि वह अपनी सहेलियों को भी कुछ नहीं बता पाई जबकि परीक्षाओं के समय में उसकी सभी सहेलियों से रोज ही बातचीत होती रही क्यूंकि सभी लड़कियों का परीक्षा केंद्र एक ही था,लेकिन उसे स्वयं ही अपने इस प्रवास की जानकारी नहीं थी। फिर भी उसे एक युक्ति सूझ ही गई थी ,कि वह प्रभा को एक पत्र लिख कर यह सूचना दे ही देगी तो कमलेश्वर तक भी बात पहुँच ही जायेगी। एक बार बात बात में ही प्रभा ने बता दिया था कि सिर्फ उसके पापा के प्रेम मेडिकल स्टोर के नाम से ही पत्र पहुँच जाता था।
इधर कमलेश्वर परीक्षा देकर घर लौटा तो एक सप्ताह में चार बार तहसील की तरफ हो आया था ,लेकिन बंगले में कोई चहल पहल तो छोडो उसके मुख्य द्वार पर अधिकांशतः ताला ही लगा पाया ,चौथे दिन उसने हिम्मत करके तहसील के गार्ड से पूछ ही लिया कि "मैडम कहीं गईं हैं क्या ? उसने सही सही बता दिया कि वो कहीं दूसरे गांव गए हैं रिश्तेदारी में अब तो दो महीने की छुट्टियों के बाद ही आएंगे। साहब का खाना तो रसोइया ही बनाता है।
सुन कर कमलेश्वर निराशा के गहन अन्धकार में खो गया। साइकिल के पैडल मारना भी भारी हो रहा था। -----क्रमशः ---------
उसे इस बात से बड़ी बेचैनी लग रही थी कि वह अपनी सहेलियों को भी कुछ नहीं बता पाई जबकि परीक्षाओं के समय में उसकी सभी सहेलियों से रोज ही बातचीत होती रही क्यूंकि सभी लड़कियों का परीक्षा केंद्र एक ही था,लेकिन उसे स्वयं ही अपने इस प्रवास की जानकारी नहीं थी। फिर भी उसे एक युक्ति सूझ ही गई थी ,कि वह प्रभा को एक पत्र लिख कर यह सूचना दे ही देगी तो कमलेश्वर तक भी बात पहुँच ही जायेगी। एक बार बात बात में ही प्रभा ने बता दिया था कि सिर्फ उसके पापा के प्रेम मेडिकल स्टोर के नाम से ही पत्र पहुँच जाता था।
इधर कमलेश्वर परीक्षा देकर घर लौटा तो एक सप्ताह में चार बार तहसील की तरफ हो आया था ,लेकिन बंगले में कोई चहल पहल तो छोडो उसके मुख्य द्वार पर अधिकांशतः ताला ही लगा पाया ,चौथे दिन उसने हिम्मत करके तहसील के गार्ड से पूछ ही लिया कि "मैडम कहीं गईं हैं क्या ? उसने सही सही बता दिया कि वो कहीं दूसरे गांव गए हैं रिश्तेदारी में अब तो दो महीने की छुट्टियों के बाद ही आएंगे। साहब का खाना तो रसोइया ही बनाता है।
सुन कर कमलेश्वर निराशा के गहन अन्धकार में खो गया। साइकिल के पैडल मारना भी भारी हो रहा था। -----क्रमशः ---------
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