सारी रात कमलेश्वर सो नहीं सका। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर बिना बताये इस तरह अंजुरी क्यों चली गई थी। दूसरे दिन वह फिर तहसील की तरफ निकल गया ,बेमतलब सा चक्कर लगा कर लौट आया। तीसरे दिन वह टेकरी पर जा कर देवी माँ के दर्शन कर आया ,झाड़ियों के बीच वह छुपी हुई जगह देख कर उसे अंजुरी की बहुत याद आने लगी थी ,उसे यह महसूस हुआ कि अंजुरी अब उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी और वह स्वयं को समस्त ऊर्जा विहीन व्यक्तित्व सा अनुभव कर रहा था। कुछ देर वह वहीँ बैठ गया ,अंजू के साथ बिताये क्षणों को मानस पटल पर दोहरा रहा था।
अगले चार दिन वह घर में ही रहा और एक पुराना सा उपन्यास पढता रहा। अगले दिन वह बाजार चला गया ,उसे प्रभा दिखाई दे गई। वह मुस्कुरा दी ,यह अनपेक्षित था। वह रुक गई ,उसने कहा उसे अंजू की चिट्ठी मिली है और उसने लिखा है कि उसे खुद पता नहीं था ,परीक्षा देकर लौटने के अगले दिन का ही रिजर्वेशन पापा ने करा दिया था वह किसी को बता नहीं सकी। " मैंने उसे जवाब लिख दिया है,उसने तुम्हे बताने को कह दिया था ,अब दो महीने बाद नए सत्र में ही मुलाकात होगी "वह जल्दी जल्दी अब कुछ ऑल कर चल दी। कमलेश्वर ने राहत की सांस ली ,यह सोच कर कि अंजुरी को उसकी चिंता थी और उसने उस तक सन्देश पहुँचाया। वह घर लौट आया।
अब उसे व्यस्त रहने का रास्ता ढूँढना था। उसने अगले दिन से एक विशेष दिनचर्या बना ली। वह सुबह जल्दी उठने लगा ,रोज टेकरी पर जाकर देवी माँ के दर्शन कर आता ,फिर नाश्ता करके, सार्वजनिक पुस्तकालय जाता ,वहीँ बैठ कर समाचार पत्र पढता एकाध पुस्तक भी इशू करता और लौट आता ,दोपहर के खाने के बाद अपने कमरे में ही वह पूरा उपन्यास पढ़ डालता। पापा से औपचारिक सी बात होती। इसी तरह उसके दिन बीतने लगे।
उधर अंजुरी अपनी नानी के यहाँ कमलेश्वर को स्मृति में अपने दिन बिता रही थी। वह बचपन से ही वहां आया करती थी और पास पड़ौस की कुछ लड़कियां जिनके साथ वह बचपन से खेलती आयी थी ,उनमे कुछ ससुराल चली गईं थीं। और अंजुरी भी अब पहले वाली अंजुरी कहाँ थी ,वह अपने साथ कमलेश्वर को ले आयी थी ,अपने दिल में बसा के ----क्रमशः -----
अगले चार दिन वह घर में ही रहा और एक पुराना सा उपन्यास पढता रहा। अगले दिन वह बाजार चला गया ,उसे प्रभा दिखाई दे गई। वह मुस्कुरा दी ,यह अनपेक्षित था। वह रुक गई ,उसने कहा उसे अंजू की चिट्ठी मिली है और उसने लिखा है कि उसे खुद पता नहीं था ,परीक्षा देकर लौटने के अगले दिन का ही रिजर्वेशन पापा ने करा दिया था वह किसी को बता नहीं सकी। " मैंने उसे जवाब लिख दिया है,उसने तुम्हे बताने को कह दिया था ,अब दो महीने बाद नए सत्र में ही मुलाकात होगी "वह जल्दी जल्दी अब कुछ ऑल कर चल दी। कमलेश्वर ने राहत की सांस ली ,यह सोच कर कि अंजुरी को उसकी चिंता थी और उसने उस तक सन्देश पहुँचाया। वह घर लौट आया।
अब उसे व्यस्त रहने का रास्ता ढूँढना था। उसने अगले दिन से एक विशेष दिनचर्या बना ली। वह सुबह जल्दी उठने लगा ,रोज टेकरी पर जाकर देवी माँ के दर्शन कर आता ,फिर नाश्ता करके, सार्वजनिक पुस्तकालय जाता ,वहीँ बैठ कर समाचार पत्र पढता एकाध पुस्तक भी इशू करता और लौट आता ,दोपहर के खाने के बाद अपने कमरे में ही वह पूरा उपन्यास पढ़ डालता। पापा से औपचारिक सी बात होती। इसी तरह उसके दिन बीतने लगे।
उधर अंजुरी अपनी नानी के यहाँ कमलेश्वर को स्मृति में अपने दिन बिता रही थी। वह बचपन से ही वहां आया करती थी और पास पड़ौस की कुछ लड़कियां जिनके साथ वह बचपन से खेलती आयी थी ,उनमे कुछ ससुराल चली गईं थीं। और अंजुरी भी अब पहले वाली अंजुरी कहाँ थी ,वह अपने साथ कमलेश्वर को ले आयी थी ,अपने दिल में बसा के ----क्रमशः -----
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