अंजुरी घर से पैदल ही निकल पड़ी। मम्मी को बताती गई ,' आज पहला दिन है देर भी हो सकती है ,टाइम टेबल भी पता चलेगा ,फीस जमा करनी है किताबों की लिस्ट लेनी है ,मम्मी पापा हंसने लगे वह तीसरी बार बता रही थी ,सुबह ही उसने लंच ले जाने की बात की थी ,लंच बॉक्स और वाटर बॉटल रख चुकी थी। वह भी हंसती हुई उत्साह से चल पड़ी। वह साढ़े नौ बजे ही पहुँच गई थी। उसे आशा थी कि आज पहले दिन सभी जल्दी आएंगे ,लेकिन ऐसा कुछ नहीं था ,वह अहाते की बेंच पर बैठ गई। रामदयाल उसे देख चुका था। उसी समय अंजुरी ने कमलेश्वर को आते देखा, उसे नहीं पता क्यों लेकिन उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा ,इतनी ज़ोर से कि उसे लगा कि वह स्वयं उसे सुन पा रही है। तब तक कमलेश्वर साइकिल स्टैंड पर लगा ओर आ गया। वह रूठा हुआ सा लग रहा था ,"तुम तो अचानक ही गायब हो गई ?"मैंने प्रभा को लिखा तो था ? मुझे खुद ही पता नहीं था ,पापा ने सरप्राइज देने के लिए ही ऐसा किया था। "दर असल मुझे बचपन से ही नानी के यहाँ जाना बहुत अच्छा लगता रहा ,इसलिए परीक्षा के बाद छुट्टियां बिताने मैं हमेशा वहीँ जाती रही हूँ। "लेकिन तुमने मुझे तो यह बात नहीं बताई थी "वह अब तक नाराज़ लग रहा था और उसका यह रूप भी अंजुरी के लिए भी नया ही था ,उसे बहुत अच्छा लग रहा था ,वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी। जब कमलेश्वर ने उसे मुस्कुराते देखा तो उसका क्रोध और बढ़ गया,शायद वह पहले बार ही अधिकार पूर्वक किसी पर नाराज़ हो रहा था।
अच्छा बाबा सॉरी ! अब गुस्सा छोडो और मुस्कुरा दो ! कुछ अच्छी बातें करो। कैसे बिताये ये दिन ? मेरे तो बहुत मुश्किल से बीते ,जितना ही मुझे नानी के घर जाना अच्छा लगता था ,इस बार मेरा सारा ध्यान यहीं लगा रहा। "अब कमलेश्वर मुस्कुराने लगा। उसे लगा कि सारी छुट्टियां उसे याद करती रही थी।
तब तक और छात्र छत्राएं और प्राध्यापक वर्ग भी आने लगे। महाविद्यालय में चहल पहल गई और व्यस्तता भी। टाइम टेबल भी लग गया था ,पुस्तकों की लिस्ट भी मिल गई थी। फीस वगैरह के काउंटर पर भी लाइन लगी थी। अंजुरी और कमलेश्वर ने अपने सभी काम पहले ही पूरे कर लिए थे और वे दोनों ही सबकी नज़रें बचा कर टेकरी पर जा पहुंचे।
अच्छा बाबा सॉरी ! अब गुस्सा छोडो और मुस्कुरा दो ! कुछ अच्छी बातें करो। कैसे बिताये ये दिन ? मेरे तो बहुत मुश्किल से बीते ,जितना ही मुझे नानी के घर जाना अच्छा लगता था ,इस बार मेरा सारा ध्यान यहीं लगा रहा। "अब कमलेश्वर मुस्कुराने लगा। उसे लगा कि सारी छुट्टियां उसे याद करती रही थी।
तब तक और छात्र छत्राएं और प्राध्यापक वर्ग भी आने लगे। महाविद्यालय में चहल पहल गई और व्यस्तता भी। टाइम टेबल भी लग गया था ,पुस्तकों की लिस्ट भी मिल गई थी। फीस वगैरह के काउंटर पर भी लाइन लगी थी। अंजुरी और कमलेश्वर ने अपने सभी काम पहले ही पूरे कर लिए थे और वे दोनों ही सबकी नज़रें बचा कर टेकरी पर जा पहुंचे।
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