हलाहल----
नहीं तोड़ते ये विश्वास,
ये होते कर्तव्य परायण ,
मातपिता और परिवार में ,
ढूंढ़ते रहते हैं रामायण।
सच के साथी,झूठ के दुश्मन,
बिना किसी भी लोभ प्रलोभन,
ये करते जनमत तैयार ,
ये जागरूक ,ये समझदार।
इनसे डरते कपटी नेता ,
इनसे डरते घूसखोर,
निडर बनाती सच की ताक़त,
इनका मत,मत है अनमोल।
थोड़े वेतन का संयोजन,
करते इस प्रकार अकिंचन,
हो जाते सारे निर्वाह ,
मिल जाता है एक निकेतन।
क्या खाता है क्या पाता है,
कैसे जीता है यह वर्ग,
चतुराई से ,कटु सत्य छुपा कर,
कैसे हँस पता यह वर्ग।
इनका जीवन सच्चा जीवन,
कटु सत्यों से संघर्षों से,
लड़ते भिड़ते ये आजीवन,
किन्तु न कर पाते संवर्धन!
नहीं तोड़ते ये विश्वास,
ये होते कर्तव्य परायण ,
मातपिता और परिवार में ,
ढूंढ़ते रहते हैं रामायण।
सच के साथी,झूठ के दुश्मन,
बिना किसी भी लोभ प्रलोभन,
ये करते जनमत तैयार ,
ये जागरूक ,ये समझदार।
इनसे डरते कपटी नेता ,
इनसे डरते घूसखोर,
निडर बनाती सच की ताक़त,
इनका मत,मत है अनमोल।
थोड़े वेतन का संयोजन,
करते इस प्रकार अकिंचन,
हो जाते सारे निर्वाह ,
मिल जाता है एक निकेतन।
क्या खाता है क्या पाता है,
कैसे जीता है यह वर्ग,
चतुराई से ,कटु सत्य छुपा कर,
कैसे हँस पता यह वर्ग।
इनका जीवन सच्चा जीवन,
कटु सत्यों से संघर्षों से,
लड़ते भिड़ते ये आजीवन,
किन्तु न कर पाते संवर्धन!
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