हलाहल-----
फटता बैग टूटते जूते,
उस पर मोची की सिलाई,
इनके मन की कुंठा बन गयी,
बरसों से रुकी हुई रुलाई।
कुंठित पिता माता भी कुंठित,
गिने चुने रुपयों का गंणित
उनके हिस्से क्यों तृष्णा है,
क्यों नहीं लिखे हैं सपने अगणित।
इनके बच्चे एक या दो,
पढ़ने में होते होशियार,
कार्यकुशल कर्तव्य निष्ठ भी,
मात पिता से पायें प्यार।
धीरे धीरे टूट रहे हैं,
इनमे भी सांझे परिवार ,
ज्यादा खर्च,कमाई कम,
कैसे निभे ये करें विचार।
फटता बैग टूटते जूते,
उस पर मोची की सिलाई,
इनके मन की कुंठा बन गयी,
बरसों से रुकी हुई रुलाई।
कुंठित पिता माता भी कुंठित,
गिने चुने रुपयों का गंणित
उनके हिस्से क्यों तृष्णा है,
क्यों नहीं लिखे हैं सपने अगणित।
इनके बच्चे एक या दो,
पढ़ने में होते होशियार,
कार्यकुशल कर्तव्य निष्ठ भी,
मात पिता से पायें प्यार।
धीरे धीरे टूट रहे हैं,
इनमे भी सांझे परिवार ,
ज्यादा खर्च,कमाई कम,
कैसे निभे ये करें विचार।
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