हलाहल---
दादी नानी की सुनी कहानी,
स्वर्ग नर्क की बनी तस्वीर
देख लिए दोनों धरती पर,
स्वर्ग सा नेता का घर,नर्क सा निर्धन कुटीर।
प्रभु क्यों इतने दुःख यहाँ हैं,
क्यों दुखिया तेरा संसार,
कपटी खाता दूध मलाई ,
क्यों गरीब पर भूख की मार।
भोजन आभाव वस्त्र आभाव,
रहने को छत का आभाव,
जीने को बुद्धि का आभाव,
इनका जीवन बस आभाव।
क्या इनका जीना क्या मरना,
कोई नहीं है इनका अपना,
इनकी मृत्यु पर नहीं किसी के,
मन में उठती है संवेदना।
दादी नानी की सुनी कहानी,
स्वर्ग नर्क की बनी तस्वीर
देख लिए दोनों धरती पर,
स्वर्ग सा नेता का घर,नर्क सा निर्धन कुटीर।
प्रभु क्यों इतने दुःख यहाँ हैं,
क्यों दुखिया तेरा संसार,
कपटी खाता दूध मलाई ,
क्यों गरीब पर भूख की मार।
भोजन आभाव वस्त्र आभाव,
रहने को छत का आभाव,
जीने को बुद्धि का आभाव,
इनका जीवन बस आभाव।
क्या इनका जीना क्या मरना,
कोई नहीं है इनका अपना,
इनकी मृत्यु पर नहीं किसी के,
मन में उठती है संवेदना।
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