हड्डी के ढांचे सा गात,
रहे कुपोषण से सिंचित,
इसीलिए इनमे होतीं है,
कई व्याधियां चिर सिंचित।
खून से निचुड़े ये शरीर ,
मिले न मिले रोटियां,
लेकिन पुलिस वाले इनकी,
भी, नोचते हैं बोटियाँ।
अधिकार माँगने पर टूटे सर,
टूटे साड़ी हड्डियाँ,
निरंकुश सी पुलिस,
ऐसी बरसाती हैं लाठियां।
अज्ञानी से इसी वर्ग ने,
गलत कर दिया सब हिसाब,
जनसँख्या में ये तादाद,
जैसे उमड़ा हो सैलाब।
भारत की जनसँख्या अधिकांश,
गरीबी की रेखा के पार,
नारकीय जीवन को बाध्य ,
शब्द परे लिखना वृतांत।
जैसे मुर्गी का दरबा,
जैसे घोंसला पंछी का,
झुग्गी में रहता है वैसे ,
कहने को बस है इंसान।
गंदे नाले के तीर बसी ,
हजारो झुग्गियों की तादाद,
प्रदूषित वायु मख्खी मछर,
प्रदूषित जल जीवन लाचार।
संख्या में ये सबसे ज्यादा,
भारत के ये सब मतदाता,
नोट लेकर देते वोट,
न जाने नेता की खोट।
सम्प्रदाय और जातपांत का,
इनके मत पर पड़े प्रभाव,
घाघ चतुर,चालाक से नेता,
डालें इनपर दुष्प्रभाव।--------निरंतर [ कंटीन्यू]
रहे कुपोषण से सिंचित,
इसीलिए इनमे होतीं है,
कई व्याधियां चिर सिंचित।
खून से निचुड़े ये शरीर ,
मिले न मिले रोटियां,
लेकिन पुलिस वाले इनकी,
भी, नोचते हैं बोटियाँ।
अधिकार माँगने पर टूटे सर,
टूटे साड़ी हड्डियाँ,
निरंकुश सी पुलिस,
ऐसी बरसाती हैं लाठियां।
अज्ञानी से इसी वर्ग ने,
गलत कर दिया सब हिसाब,
जनसँख्या में ये तादाद,
जैसे उमड़ा हो सैलाब।
भारत की जनसँख्या अधिकांश,
गरीबी की रेखा के पार,
नारकीय जीवन को बाध्य ,
शब्द परे लिखना वृतांत।
जैसे मुर्गी का दरबा,
जैसे घोंसला पंछी का,
झुग्गी में रहता है वैसे ,
कहने को बस है इंसान।
गंदे नाले के तीर बसी ,
हजारो झुग्गियों की तादाद,
प्रदूषित वायु मख्खी मछर,
प्रदूषित जल जीवन लाचार।
संख्या में ये सबसे ज्यादा,
भारत के ये सब मतदाता,
नोट लेकर देते वोट,
न जाने नेता की खोट।
सम्प्रदाय और जातपांत का,
इनके मत पर पड़े प्रभाव,
घाघ चतुर,चालाक से नेता,
डालें इनपर दुष्प्रभाव।--------निरंतर [ कंटीन्यू]
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