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रविवार, 8 मार्च 2020

Wajood Se : By Nirupama Sinha !!{37} Khauf !!

खौफ-----

ये पहले एक लफ्ज़ था,
जिसे पढ़ा या सुना करती थी मैं,
आज ये है एक तजुर्बा,
क्योंकि आज मेरे पास है वक़्त का वो हिस्सा,
जो सुनने में तो लगता है बहुत कम,
लेकिन होता है सदियों की तरह,
जिसके साये में गुज़ारे हैं मैंने,
वो लम्हें ,जो कभी नहीं भूलेंगे,
सामने खड़ी थी मौत,
अपने ही घर में कैद बेबसी,
अपने सामने खुद को लुटते देखने की लाचारी,
और हर पल मौत का खटका,
चाहे जितने हों अल्फाज़ बेहतरीन,
चाहे जितना हो मज़मून खरा,
महसूस नहीं कर सकता कोई,
जो मैंने महसूस किया,
खौफ के उन लम्हों को मैंने ,
मर- मर के कैसे जिया!

खौफ--आतंक,मज़मून--लिखित व्याख्या 

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