परिणय-------
जीवन पथ के एक स्थान पर,
मिल जाते हैं दो अपरिचित,
चलते चलते बन जाते हैं,
वे प्रियतम वे चिरपरिचित।
चाहे सुख के क्षण हों अप्रतिम,
या दुःख कर दे अति व्यथित,
इक दूजे का हाथ थाम कर,
समय सदा करते व्यतीत।
यह संबंध सबसे गहन,
विश्वास प्रेम पर आधारित,
नवजीवन का नव सृजन ,
दोनों ही करते अंकित।
इस बिन वह और उस बिन यह,
अपूर्ण हैं सुख ना किंचित,
प्रभु के घर ही होता निश्चित ,
परस्पर यह संबंध निर्धारित!
शब्द--अर्थ--अप्रतिम--अतुलनीय,सृजन--रचना
जीवन पथ के एक स्थान पर,
मिल जाते हैं दो अपरिचित,
चलते चलते बन जाते हैं,
वे प्रियतम वे चिरपरिचित।
चाहे सुख के क्षण हों अप्रतिम,
या दुःख कर दे अति व्यथित,
इक दूजे का हाथ थाम कर,
समय सदा करते व्यतीत।
यह संबंध सबसे गहन,
विश्वास प्रेम पर आधारित,
नवजीवन का नव सृजन ,
दोनों ही करते अंकित।
इस बिन वह और उस बिन यह,
अपूर्ण हैं सुख ना किंचित,
प्रभु के घर ही होता निश्चित ,
परस्पर यह संबंध निर्धारित!
शब्द--अर्थ--अप्रतिम--अतुलनीय,सृजन--रचना
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें