खुदगर्ज------
एहसान फरामोशों से भरी है दुनिया,
खुदगर्ज इंसानों का हुजूम है,
सिर्फ खुद को सोचता है,
खुद के लिए करता है सबकुछ,
खुद से बाहर न देखता है कुछ,
न सुनना चाहता है कुछ,
इसे खुदा ने बनाना चाहा था कुछ,
इसकी शक्ल बन गई है,
और ही कुछ!
खुदी-------
अपनी ही दोस्त हूँ मैं,
बातें किया करती हूँ खुद से,
चाहती हूँ इस खुदी को शदीद,
यही मेरी हमदम है,यही हबीब,
यह मुझे कभी तनहा नहीं छोड़ती,
बड़ा खयाल रखती है मेरा,
कभी दिल नहीं तोडती,
पुचकारती है आंसू भी पोंछती है,
गर मैं हो जाती हूँ ग़मगीन,
अक्सर खुशियों में इसे भूल जाती हूँ मैं,
गम में ये फिर भी नहीं भूलती मुझे,
यही तो है जो हौंसला देती रहती है,
मरते दम तक साथ निभाएगी मेरा,
दम तोड़ देगी,जब यहाँ न रहूंगी मैं!
शब्द--अर्थ--खुदी--स्वयं,शदीद--बहुत ज्यादा,हबीब--प्रियजन
ख्वाब----
इंतज़ार था बरसों से जिस बेनजीर लम्हे का,
बस आ ही पहुंचा है मेरे दर तक,
सुनती आई थी,कि ख्वाब भी सच हुआ करते हैं,
मैंने भी देखा था एक,पहर दर पहर तक,
इंतजार करती रही,सुबह से शाम,और शाम से सहर तक,
पहले सुनी आहट ,अब पड़ने लगी है दस्तक,
रहना चाहती हूँ होशमंद,रख लेना चाहती हूँ,
इसे आँखों में,दिल में,महफूज़,
खो न जाए कहीं,पड़ न जाए कोई खलल,
होने को इसके असर तक!
शब्द--अर्थ--बेनजीर-अतुलनीय,पहर दर पहर--प्रहर जो चार घंटे का होता है,महफूज़--सुरक्षित,खलल-विघ्न
एहसान फरामोशों से भरी है दुनिया,
खुदगर्ज इंसानों का हुजूम है,
सिर्फ खुद को सोचता है,
खुद के लिए करता है सबकुछ,
खुद से बाहर न देखता है कुछ,
न सुनना चाहता है कुछ,
इसे खुदा ने बनाना चाहा था कुछ,
इसकी शक्ल बन गई है,
और ही कुछ!
खुदी-------
अपनी ही दोस्त हूँ मैं,
बातें किया करती हूँ खुद से,
चाहती हूँ इस खुदी को शदीद,
यही मेरी हमदम है,यही हबीब,
यह मुझे कभी तनहा नहीं छोड़ती,
बड़ा खयाल रखती है मेरा,
कभी दिल नहीं तोडती,
पुचकारती है आंसू भी पोंछती है,
गर मैं हो जाती हूँ ग़मगीन,
अक्सर खुशियों में इसे भूल जाती हूँ मैं,
गम में ये फिर भी नहीं भूलती मुझे,
यही तो है जो हौंसला देती रहती है,
मरते दम तक साथ निभाएगी मेरा,
दम तोड़ देगी,जब यहाँ न रहूंगी मैं!
शब्द--अर्थ--खुदी--स्वयं,शदीद--बहुत ज्यादा,हबीब--प्रियजन
ख्वाब----
इंतज़ार था बरसों से जिस बेनजीर लम्हे का,
बस आ ही पहुंचा है मेरे दर तक,
सुनती आई थी,कि ख्वाब भी सच हुआ करते हैं,
मैंने भी देखा था एक,पहर दर पहर तक,
इंतजार करती रही,सुबह से शाम,और शाम से सहर तक,
पहले सुनी आहट ,अब पड़ने लगी है दस्तक,
रहना चाहती हूँ होशमंद,रख लेना चाहती हूँ,
इसे आँखों में,दिल में,महफूज़,
खो न जाए कहीं,पड़ न जाए कोई खलल,
होने को इसके असर तक!
शब्द--अर्थ--बेनजीर-अतुलनीय,पहर दर पहर--प्रहर जो चार घंटे का होता है,महफूज़--सुरक्षित,खलल-विघ्न
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