हकीकत-----
जिस दम निकलता है दम,आती है मौत,
हो जाती है रूह फ़ना,
उसी दम हो जाती है गुम,एक शख्सियत,
एक इन्सान,उसका ओहदा,उसका रिश्ता,और उसका नाम,
उसी दम रह जाता है वह,महज एक मुर्दा जिस्म,
जिसे आनन् फानन लोग जमीं पर उतार देते हैं,
और चंद घंटों बाद जमीन के नीचे भी उतार देते हैं,
या जला कर खाक कर देते हैं,मिटा देते हैं नामो निशां ,
रह जाती है एक तस्वीर,जिसके आगे धूप जलाते हैं,
अगरबत्तियां जलातें हैं,उस पर फूलों के हार भी चढाते हैं,
चलता है यह सिलसिला चंद रोज,
फिर वह तस्वीर दीवार पर टंग जाती है,धूल खाती है,
कभी कभी ही जाती है जिस पर नज़र,
और एक अरसे बाद जब वह जिन्दा लोगों की जिंदगी से मेल नहीं खाती ,
तो उतार कर अलमारी या बक्स में रख दी जाती है,
वहीँ पर टूटती फूटती है,
और किसी दिन घर के कबाड़ में पड़ी नजर आती है!
शब्द अर्थ---रूह फना होना==आत्मा का शरीर से निकलजाना
हर्फ़----------
बयाँ नहीं हो सकता नाकामयाबी का दर्द,
कसकता रहता है,सीने में हर वक़्त ,हरदम,बेदर्द,
गुमशुदा लफ़्ज़ों की ,करती हूँ तलाश,
कोई तहरीर भी नहीं ,दे पाती मानी ,
हो गई हूँ हताश,हर्फ़ लगते हैं बेजान,
लिखती रहती हूँ,मिटाती रहती हूँ,अपना ही लिखा,
सोचती रहती हूँ,भला कौन,
मिटा सकता है मुकद्दर का लिखा,
जो लिखा है न जाने कौन सी सियाही से,
दिखाई तो नहीं पड़ता,
लेकिन इसका हर्फ़ बा हर्फ़ कितना है कडा !
शब्द अर्थ--तहरीर-लिखित,हर्फ़-अक्षर
जिस दम निकलता है दम,आती है मौत,
हो जाती है रूह फ़ना,
उसी दम हो जाती है गुम,एक शख्सियत,
एक इन्सान,उसका ओहदा,उसका रिश्ता,और उसका नाम,
उसी दम रह जाता है वह,महज एक मुर्दा जिस्म,
जिसे आनन् फानन लोग जमीं पर उतार देते हैं,
और चंद घंटों बाद जमीन के नीचे भी उतार देते हैं,
या जला कर खाक कर देते हैं,मिटा देते हैं नामो निशां ,
रह जाती है एक तस्वीर,जिसके आगे धूप जलाते हैं,
अगरबत्तियां जलातें हैं,उस पर फूलों के हार भी चढाते हैं,
चलता है यह सिलसिला चंद रोज,
फिर वह तस्वीर दीवार पर टंग जाती है,धूल खाती है,
कभी कभी ही जाती है जिस पर नज़र,
और एक अरसे बाद जब वह जिन्दा लोगों की जिंदगी से मेल नहीं खाती ,
तो उतार कर अलमारी या बक्स में रख दी जाती है,
वहीँ पर टूटती फूटती है,
और किसी दिन घर के कबाड़ में पड़ी नजर आती है!
शब्द अर्थ---रूह फना होना==आत्मा का शरीर से निकलजाना
हर्फ़----------
बयाँ नहीं हो सकता नाकामयाबी का दर्द,
कसकता रहता है,सीने में हर वक़्त ,हरदम,बेदर्द,
गुमशुदा लफ़्ज़ों की ,करती हूँ तलाश,
कोई तहरीर भी नहीं ,दे पाती मानी ,
हो गई हूँ हताश,हर्फ़ लगते हैं बेजान,
लिखती रहती हूँ,मिटाती रहती हूँ,अपना ही लिखा,
सोचती रहती हूँ,भला कौन,
मिटा सकता है मुकद्दर का लिखा,
जो लिखा है न जाने कौन सी सियाही से,
दिखाई तो नहीं पड़ता,
लेकिन इसका हर्फ़ बा हर्फ़ कितना है कडा !
शब्द अर्थ--तहरीर-लिखित,हर्फ़-अक्षर
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