ड्राइवर रघुनाथ और गार्ड चले गए और अंजुरी के लिए स्वयं को सम्हालना कठिन हो गया। उसने बरामदे की मुंडेर थाम ली। कुछ क्षणों के बाद वह धीमी गति से अपने कमरे में चली गई। वह पलंग पर बैठ गई। उसकी आँखों के सामने अन्धकार सा छा रहा था। मस्तिष्क में आंधियां चल रहीं थीं। "क्या यह सत्य है ? अथवा कोई भ्रम ? उसके लिए ड्राइवर और गार्ड का वार्तालाप एक बिजली गिरने सा अनुभव था। उसका सारा शरीर कंपकंपा रहा था,जैसे किसी बड़े आघात से किसी की दशा हो ,वही दशा अंजुरी की थी। अभी इस क्षण उसे अनुभव हो रहा था कि कमलेश्वर उसकी सबसे बड़े संपत्ति है ,वह उसका सबसे बड़ा सुख ,उसके मन की सर्वाधिक उत्कट इच्छा,अति प्रिय है और यदि वह उसका नहीं है तो यह जीवन व्यर्थ है।
इतनी साहसी ,बुद्धिमान ,ऊर्जा से परिपूर्ण अंजुरी की स्थिति एकदम से दयनीय सी हो गई थी। उसे यह अनुभव हो रहा था कि कमलेश्वर को पाना विश्व का सबसे दुरूह कठिन कार्य हो गया है। कमलेश्वर की छवि मन पटल पर उभरते ही यह इच्छा तीव्रता से उठी कि कमलेश्वर पर केवल उसका अधिकार है और जब उस लड़की अंजलि का नाम मन में गूंजा तो उसे तीव्र क्रोध ,द्वेष ,और डाह की अनुभूति हुई। वह कमलेश्वर के नाम के साथ किसी का नाम और उसके जीवन से जुड़ा किसी और का जीवन उसके लिए असहनीय अनुभव हो रहा था। उसकी आँखों के सामने रतनगढ़ आने के पश्चात् से लेकर अब तक के स्वयं के और कमलेश्वर के संगति के कोमल क्षण उभरने लगे और सबसे नवीनतम ,जब उसने अचानक ही मंदिर में देवी माँ के सकोरे से उठा कर उसकी मांग में सिन्दूर भर दिया था। अंजुरी ने किस प्रकार उसका हाथ पकड़ कर मंदिर की सात परिक्रमा लगाईं थी। और फिर यह विचार मन में आते ही उसकी रुलाई फूट पडी। किन्तु वह जोर से रो भी नहीं सकती थी ,वह अपना मुंह दबा कर रोती रही,तकिया भींग चुका था। अचानक ही अलार्म की आवाज़ से वह चौंक गई। सुबह के छह बज गए थे "ओह ! रात बीत गई ,वह बैठी ही रह गई थी ,बोझिल सी ,अनिश्चितता से भरी ,उदास और दुखों के पहाड़ सी सुबह उसके सामने थी --क्रमशः -----
इतनी साहसी ,बुद्धिमान ,ऊर्जा से परिपूर्ण अंजुरी की स्थिति एकदम से दयनीय सी हो गई थी। उसे यह अनुभव हो रहा था कि कमलेश्वर को पाना विश्व का सबसे दुरूह कठिन कार्य हो गया है। कमलेश्वर की छवि मन पटल पर उभरते ही यह इच्छा तीव्रता से उठी कि कमलेश्वर पर केवल उसका अधिकार है और जब उस लड़की अंजलि का नाम मन में गूंजा तो उसे तीव्र क्रोध ,द्वेष ,और डाह की अनुभूति हुई। वह कमलेश्वर के नाम के साथ किसी का नाम और उसके जीवन से जुड़ा किसी और का जीवन उसके लिए असहनीय अनुभव हो रहा था। उसकी आँखों के सामने रतनगढ़ आने के पश्चात् से लेकर अब तक के स्वयं के और कमलेश्वर के संगति के कोमल क्षण उभरने लगे और सबसे नवीनतम ,जब उसने अचानक ही मंदिर में देवी माँ के सकोरे से उठा कर उसकी मांग में सिन्दूर भर दिया था। अंजुरी ने किस प्रकार उसका हाथ पकड़ कर मंदिर की सात परिक्रमा लगाईं थी। और फिर यह विचार मन में आते ही उसकी रुलाई फूट पडी। किन्तु वह जोर से रो भी नहीं सकती थी ,वह अपना मुंह दबा कर रोती रही,तकिया भींग चुका था। अचानक ही अलार्म की आवाज़ से वह चौंक गई। सुबह के छह बज गए थे "ओह ! रात बीत गई ,वह बैठी ही रह गई थी ,बोझिल सी ,अनिश्चितता से भरी ,उदास और दुखों के पहाड़ सी सुबह उसके सामने थी --क्रमशः -----
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