बोझिल कदमों से अंजुरी उठी और तैयार होने लगी। महाविद्यालय तो उसे बारह बजे जाना था,{बारह बजे जानाभी ऐच्छिक था }किन्तु साढ़े नौ बजे ही घर से निकल पडी। आज पापा भी दौरे पर गए थे। मम्मी ने उसे नाश्ता करा दिया था। उसने कल ही बता दिया था कि उसका लंच और रात का भोजन कार्यक्रम के बाद महाविद्यालय में ही होगा। मम्मी को "मैं जा रही हूँ बोल कर अंजुरी निकल गई। " अंजुरी निकल तो आयी लेकिन उसे समझ नहीं आया कि कहाँ जाए ? शायद अभी महाविद्यालय में कोई ना हो। अचानक ही उसे कैलाश आता हुआ दिखाई दिया ,उसने रुक कर पूछा इधर कैसे जा रहे हो कैलाश ? उसने बताया कि उसका खेत है तहसील के आगे ,तो पिताजी को कुछ संदेशा देने जा रहा हूँ। "अंजुरी ने सहसा पूछ लिया ," कमलेश्वर की सगाई हो रही है क्या ? ""हाँ ! उसने कुछ उदास होकर ही कहा "वह आगे भी बोला "मुझे भी आश्चर्य हुआ कि अचानक से एक चौथी फेल बेवकूफ सी लड़की से आनन् फानन सगाई क्यों हो रही है और सिर्फ दोनों परिवार के लोग ही हैं रतनगढ़ के कुछ ख़ास लोग ही मेहमान हैं। "अंजुरी निर्विकार सी सुनती रही ,"ठीक है "सर हिलाते हुए वह बोला और चल पड़ा। अंजुरी भी आगे बढ़ गई। अब कोई शंका ही नहीं थी ,बात सच थी। वह कुछ सोचती हुई टेकरी की पगडंडी पर चल पडी।
भारी कदमों से वह सीढ़ियां चढ़ रही थी। सब कुछ सूनसान था। सीढ़ियां,झाड़ियाँ ,पेड़ और मंदिर। वह देवी माँ के सामने जा खड़ी हुई और फूट फूट कर रो पडी। वह मन ही मन सोचती भी जा रही थी कि उसके साथ यह क्यों हुआ ? क्या दो युवा अपनी इच्छा से एक दूसरे का चयन नहीं कर सकते हैं ? क्या प्रेम से ऊँची होतीं हैं जाति,प्रथा ,परंपरा ,रिवाज़ ?
उसे पहली दृष्टि में कमलेश्वर अच्छा लगा ,बौद्धिक रूप से वह अपने समकक्ष लगा। जीवनसाथी के रूप में अपनी कल्पना का साकार रूप लगा और उसके शर्मीले स्वभाव को जान कर ही उसने स्वयं ही पहल की। अपने प्रेम को प्रदर्शित किया ,और उसके भीतर के प्रेम को भी बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त किया ,और अभी एक सप्ताह पहले यहीं इसी मंदिर में देवी माँ के सामने इसी मिटटी के सकोरे से सिन्दूर की चुटकी भर कर कमलेश्वर ने उसकी मांग में भर दिया था। क्या था वह सब ? वह मन ही मन देवी माँ से पूछ रही थी ----क्रमशः ----
भारी कदमों से वह सीढ़ियां चढ़ रही थी। सब कुछ सूनसान था। सीढ़ियां,झाड़ियाँ ,पेड़ और मंदिर। वह देवी माँ के सामने जा खड़ी हुई और फूट फूट कर रो पडी। वह मन ही मन सोचती भी जा रही थी कि उसके साथ यह क्यों हुआ ? क्या दो युवा अपनी इच्छा से एक दूसरे का चयन नहीं कर सकते हैं ? क्या प्रेम से ऊँची होतीं हैं जाति,प्रथा ,परंपरा ,रिवाज़ ?
उसे पहली दृष्टि में कमलेश्वर अच्छा लगा ,बौद्धिक रूप से वह अपने समकक्ष लगा। जीवनसाथी के रूप में अपनी कल्पना का साकार रूप लगा और उसके शर्मीले स्वभाव को जान कर ही उसने स्वयं ही पहल की। अपने प्रेम को प्रदर्शित किया ,और उसके भीतर के प्रेम को भी बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त किया ,और अभी एक सप्ताह पहले यहीं इसी मंदिर में देवी माँ के सामने इसी मिटटी के सकोरे से सिन्दूर की चुटकी भर कर कमलेश्वर ने उसकी मांग में भर दिया था। क्या था वह सब ? वह मन ही मन देवी माँ से पूछ रही थी ----क्रमशः ----
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