कमलेश्वर सहसा उद्विग्न हो उठा। उसे लगा कि उसे उसी क्षण महाविद्यालय की ओर जाना चाहिए। मानस पटल पर अंजुरी की छवि उभरते ही कभी अनन्य प्रेम ,कभी भय, कभी स्वयं के कृत्य का क्षोभ इत्यादि भावनाये उमड़ने घुमड़ने लगीं। वह घर गया जल्दी से अपनी साइकिल उठाई और महाविद्यालय की ओर निकल पड़ा। तेजी से पैड़ल मारता हुआ वह महाविद्यालय जा पहुंचा। उसने साइकिल स्टैंड पर लगाईं। महाविद्यालय में पूरी सजावट की हुई थी। शाम 7 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम आरम्भ होने वाला था। इस समय दिन के बारह बजे थे। वह जानता था कि आज लाइब्रेरी बंद है ,और प्रतिस्पर्धियों के अतिरिक्त किसी भी छात्र को वहां इस समय आने के लिए कोई तर्कसंगत कारण उपलब्ध नहीं थे। कमलेश्वर ,पीछे असेंबली हॉल में जाने का लोभ संवरण ना का सका। वह दो तीन बार इधर से उधर गया किन्तु उसे अंजुरी दिखाई नहीं दी। उसे नए बैच वाले लोग ही दिखाई दिए। अचानक उसे फिर से प्रभा बाहर आती दिखाई दी। उसे देखते ही प्रभा की त्योरियां चढ़ गईं। तथापि उसने पूछ ही लिया ," तुम यहाँ कैसे ? कमलेश्वर सकपका गया ,उसने कहा ,"मैं बस एक बार अंजुरी से मिलना चाहता हूँ ""क्यों " कुछ बाकी रह गया है क्या ?""नहीं बस उससे क्षमा याचना करना हूँ "वह अभी नहीं आई है ,सिंधु मैडम ने कहा था सीनियर लड़कियों का ग्रुप डांस पूर्णतः त्रुटि रहित है अतः सिर्फ एक बार ही रिहर्सल होगी ,वह भी सबसे अंत में ""तो तुम कैसे जल्दी आ गई ? "मेरी मौसेरी बहन शुभा ,भी प्रतिभागी है ,मौसी ने कहा था मैं भी उसके साथ रहूं इसीलिए मैं जल्दी आ गई हूँ।"अब कमलेश्वर के पास कोई मार्ग ना था। उसे घर वापस जाना ही उचित लगा। उसे यह प्रतीक्षा बहुत लम्बी युगों युगों की लगी ,और स्वयं के और अंजुरी के बीच की दूरियाँ कई मीलों की लगने लगी थीं। वह थके थके क़दमों से साइकिल पर पैड़ल मारता घर जा पहुंचा।अपने कमरे में पहुंचा और बिस्तर पर कटे वृक्ष सा जा गिरा। अब उसका मस्तिष्क विचार शून्य हो गया था और वह छत की और ताक रहा था ---क्रमशः ----
मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts
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