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रविवार, 12 अप्रैल 2020

Rajwada Glory Of Indore !! A collection by Advocate Ujjawal Fanse !!


इतिहास_हमारे_शहर_की_धड़कन_गौरवशाली_विरासत_राजवाड़े_का--------
मल्हारराव होलकर को तीन अक्टूबर 1730 को मराठों ने उत्तर भारत के सैनिक अभियानों का नेतृत्व दिया। सैनिक अभियानों की व्यस्तता के कारण उन्होंने स्थायी निवास के लिए खासगी जागीर देने के लिए छत्रपति साहू से निवेदन किया। पेशवा बाजीराव ने सन् 1734 ई में मल्हार राव की पत्नी गौतमाबाई होल्कर के नाम खासगी जागीर तैयार करवायी, जिसमें इंदौर भी था। सन् 1747 में भव्य राजप्रसाद के निर्माण शुरू किया जो राजबाड़ा कहलाया।

250 साल पुरानी इमारत में छुपा है मालवा का स्वर्णिम इतिहास, मुस्लिम, राजपूत, मराठा और इतावली चारों स्थापत्य के मिश्रण वाली अनोखी ऐतिहासिक इमारत इस महल का निर्माण लगभग 250 साल पहले हुआ था| होलकर राजाओं के इस आलीशान महल राजवाड़ा के नाम का मतलब है राजे-रजवाड़ों के रहने का स्थान | राजवाड़ा फ्रेंच, मुगल और मराठा आर्किटेक्ट का मिला जुला रूप है | इंदौर का राजवाड़ा  मशहूर, ऐतिहासिक  कहा जाता है राजवाड़ा के बनने से पहले ही इसका बिगडना शुरू हो गया था |

सन 1747 में मल्हारराव प्रथम ने राजवाड़ा के निर्माण की शुरुआत की | 6174 वर्गमीटर में बना राजवाड़ा संगमरमर, लकड़ी, ईट, मिट्टी और शहद और चुने व गारे का फ्रेंच, मुगल और मराठा आर्किटेक्ट से बनी भव्य और खूबसूरत ईमारत है | 1761 में मल्लहारराव प्रथम के समय राजवाड़ा  का निर्माण कार्य रुका रहा |
1765 के बाद राजवाड़ा  बनकर तैयार हुआ| राजवाड़ा  कुल सात मंजिला महल है| नीचे की तीन मंजिले मार्बल की बनी थी| उपरी चार मंजिलों को सागौन की लकड़ी से बनवाया गया | 29 मीटर की ऊंचाई वाली इस इमारत को बनाने में मल्हा राव होलकर द्वितीय के समय चार लाख रुपए खर्च किये गये। 918 फुट लंबी और 232 फुट चौड़ी इस इमरात का आकर्षक प्रवेश द्वार 6.70 मीटर ऊंचा है | यह द्वार हिंदू शैली के महलों की तर्ज पर बना है |होलकरो का दरबार हॉल जिसे गणेश हॉल कहा जाता है, वह फ्रेंच शैली का अप्रतिम नमूना है | राजवाड़ा के ठीक सामने एक सुंदर सा बगीचा है, जिसके मध्य में महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा स्थापित है|

सिंधिया को बहुत खटकती थी होलकर की समृद्धि
सिंधिया की जलन से अब तक उबर नहीं पाया होलकरों के सपनों का महल

सन् 1747 में होलकर वंश के मल्हारराव होलकर ने अपने परिवार के निवास के लिए इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण कराया था। लेकिन पहले अहिल्याबाई का 1795 में और 1799 में तुकोजीराव की मृत्यु के पश्चात होल्करों के गृहयुद्ध में यशवंत राव (प्रथम) ने सफलता प्राप्त की और अपनी राजधानी भानपुरा बनाई।   होलकर साम्राज्य की समृद्धि सिंधिया घराने के तत्कालीन शासक दौलतराव सिंधिया को बहुत खटकती थी। उन्हीं के कहने पर सन् 1801 में सिंधिया घराने के सेनापति सरजेराव घाटगे ने होलकरों के महानुभाव पंथ के मंदिर की वजह से दक्षिणी भाग को छोड़कर राजबाड़ा जला कर नष्ट कर दिया।   1801 में जो आग लगाई गई उसकी लपटें तो बुझ गई लेकिन राजबाड़े के जलने का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि ये एतिहासिक भवन तीन बार भयंकर आग की लपटों में झुलस गया। सिंधिया ने जब ये भवन जलाया तब प्रवेश द्वार के ऊपर की पांचवी मंजिल बुरी तरह जल गई थी,क

कब बनकर तैयार हुआ राजवाड़ा
 यशवंतराव की मृत्यु के पश्चात उनकी पत्नी तुलसाबाई ने अवयस्क पुत्र मल्हार राव (द्वितीय की संरक्षिका की हैसियत से शासन किया। सन् 1717 ई में महिदपुर युद्ध के उपरांत सन् 1818 ई में हुई मंदसौर संधि की शर्त के अनुसार, होल्करों ने इंदौर को राजधानी बनाया और होल्कर परिवार इंदौर लाया गया।
होलकरों के तत्कालीन प्रधानमंत्री तात्याजोग ने जी-जान लगाकर इस मंजिल को ठीक किया ही था कि कुछ सालों बाद 1834 में दोबारा राजबाड़ा में आग लगी तब लकड़ी की बनी एक मंजिल पूर्णत: नष्ट हो गई लेकिन होलकरों ने अपने इस प्रिय भवन को ही अपना निवास स्थान बनाए रखा। यहीं पर तुकोजीराव को गोद लिया गया और इस वंश का प्रथम राजतिलक भी इसी भवन में हुआ।

दंगों की चपेट में ये एतिहासिक भवन

समय गुजरता गया और राजबाड़ा मालवा की यादों को अपने ह़ृदय में संजोता चला गया लेकिन 1984 में एक बार फिर इस भवन पर संकट आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की विवादास्पद मौत के बाद हुए दंगों की चपेट में ये एतिहासिक भवन भी आ गया और दंगाईयों ने इसके गरिमामयी इतिहास को एक बार फिर ध्वस्त कर दिया। इस बार राजबाड़े में जो आग लगाई गई उससे इस भवन को अपूर्णिय हानि हुई। इस बार इस भवन का पृष्ठ भाग इस हद तक जल गया कि उसमें सुधार की संभावना ही नहीं रही।

एक हिस्सा भरभराकर गिरना-

राजबाड़ा का एक हिस्सा तो 4 जुलाई 2016 को एकाएक ध्वस्त हो गया। इसके बाद पूरी ऐतिहासिक इमारत पर ही खतरा बना हुआ है। यहां कई और हिस्से हैं, जो पुरातत्व विभाग की अनदेखी से कमजोर हो चुके हैं। हालत यह है कि इमारत में जगह-जगह पर दरारें सामने आने लगी हैं जबकि इसे बचाने के नाम पर 1984 से लेकर अब तक सरकार और स्वयंसेवी संगठन 200 करोड़ खर्च कर चुके हैं।
राजबाड़ा के उत्तरी परकोटे (गोपाल मंदिर की गली) के हिस्से में लंबी दरारें आ चुकी है। यहां परकोटे के ऊपरी हिस्से में लगे पत्थर भी दरकने लगे हैं। यहां कई जगह पर बड़े छेद हो गए हैं, जो इस हिस्से के कमजोर होने की गवाही खुद दे रहे हैं। इसके ठीक नीचे बाजार लगने से यहां कोई घटना होने पर जनहानि होने की भी आशंका है। राजबाड़ा के मुख्य द्वार की सबसे ऊपरी पर मजिल जहां झंडा लहराता है, उसकी छत काफी कमजोर हो चुकी है। इस छत में से लगातार पानी टपकता रहता है, वहीं छत का काफी हिस्सा अब तक अंदर ही गिर चुका है जबकि सालभर पहले ही पुरातत्व विभाग ने यहां पर 1 करोड़ रुपए का मरम्मत का काम कराया था। अभी राजवाड़ा के इस हिस्से के पुनर्निमार्ण का कार्य जारी है।
संकलनकर्ता=उज्जवल फणसे
अधिवक्ता मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय इंदौर

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