कल्प वृक्ष —–
एक आदमी किसी गांव जा रहा था ,रास्ते में जांगले में भटक गया ,बेहद गर्मी थी ,भूख व प्यास से बेहाल
होकर वह एक सघन वृक्ष की छाँह में बैठ गया सोचने लगा इस वक़्त भोजन का थाल व पीने का ठंडा पानी
मिल जाता तो कितना अच्छा होता,उसका यह सोचना था कि भोजन का थाल व ठन्डे पानी की मटकी
गिलास सहित सामने आ गए,वह कल्प वृक्ष था,किन्तु वह व्यक्ति शक्की स्वभाव का था सोचने लगा कहीं
भोजन में विष मिला हुआ हो तो मेरे प्राण पखेरू ही उड़ जाएंगे,वह तुरंत मर गया। यह कल्प वृक्ष हमारे
अंदर है,अच्छा सोचें तो अच्छा होगा बुरा सोचेंगे तो बुरा होगा
Once made equal to many the woman becomes his superior–Socrates
सत्य का अधिकारी कौन है —जिसको प्रसन्नता देने के लिए संसार असमर्थ है ,अरठत जिसको भोग में रोग
,हर्ष में शोक ,संयोग में वियोग ,सुख में दुःख ,घर में वन ,जीवन में मृत्यु का अनुभव होता है वही सत्य का
अधिकारी है ,विचार दृष्टि से देखो भोग करने से शक्तियों का ह्रास होता है। –संत वाणी
चक्रवात परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च
It is struggle against nature and not conformity to it that makes man what he is
—-Swami Vivekanand
जो व्यक्ति छोटी छोटी बातों में उलझे रहने का स्वभाव बना लेते हैं वे आगे चल कर महत्वपूर्ण कार्यों को
करने हेतु अयोग्य बन जाते हैं —रोशे
अपनी त्रुटियों के बारे में हम सदैव स्वयं को धोखा देते रहते हैं और एक दिन ऐसा भी आता है जब हम
उन्ही त्रुटियों को अपने सद्गुण मानाने लगते हैं —हेन
Take care to get what you like or you will be forced to like what you get.—Bernard Shaw
Desire is the seed out of which is boru the unending cycle of birth and death.
—-Tiruvalluvar
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