श्री गुरु स्तोत्रम —–
ॐ नमः शिवाय गुरुवे सच्चिदानंद मूर्तये
निश्चप्रपंचाय शान्ताय निरलम्बाय तेज से
संसार वृक्ष माँ रूढाः पतन्ति नर कार्णवे
ये नोद धृत मिदं तस्मै श्री गुरुवे नमः
गुरुर ब्रम्हा ,गुरुर विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा
गुरुर साक्षात पर ब्रम्हा तस्मै श्री गुरुवै नमः
ज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकाय
चक्षुरुन्मीलितम् येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
अखंड मंडला कारम व्याप्तं येन चराचरम
तप्तदम दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
स्थावरम जंगमं व्याप्तं यत्किंचित सचराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
चिन्मयम् व्यापितम् सर्व त्रेलोक्य सचराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवै नमः
सर्व श्रुति शिरोरत्न येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
वेदान्ताम्बुज सूर्योय तस्मै श्री गुरुवे नमः
चैतन्य शाश्वतं शान्तं व्योमतीतं निरंजनं
बिंदु नाद कला तीतं तस्मै श्री गुरुवे नमः
ज्ञान शक्ति समारूढं स्तत्व माला विभूषितःभुक्ति मुक्ति प्रदातांच तस्मै श्री गुरुवे नमः
निश्चप्रपंचाय शान्ताय निरलम्बाय तेज से
संसार वृक्ष माँ रूढाः पतन्ति नर कार्णवे
ये नोद धृत मिदं तस्मै श्री गुरुवे नमः
गुरुर ब्रम्हा ,गुरुर विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा
गुरुर साक्षात पर ब्रम्हा तस्मै श्री गुरुवै नमः
ज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकाय
चक्षुरुन्मीलितम् येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
अखंड मंडला कारम व्याप्तं येन चराचरम
तप्तदम दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
स्थावरम जंगमं व्याप्तं यत्किंचित सचराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
चिन्मयम् व्यापितम् सर्व त्रेलोक्य सचराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवै नमः
सर्व श्रुति शिरोरत्न येन तस्मै श्री गुरुवे नमः
वेदान्ताम्बुज सूर्योय तस्मै श्री गुरुवे नमः
चैतन्य शाश्वतं शान्तं व्योमतीतं निरंजनं
बिंदु नाद कला तीतं तस्मै श्री गुरुवे नमः
ज्ञान शक्ति समारूढं स्तत्व माला विभूषितःभुक्ति मुक्ति प्रदातांच तस्मै श्री गुरुवे नमः
अनेक जन्म सम्प्राप्त कर्मबन्ध विदाहिने
आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरुवै नमः
शोषणम् भव सिन्धोश्च ज्ञापनम् सार सम्पदम्
गुरोः पादोदकं सम्यक तस्मै श्री गुरुवे नमः
न गुरुराधिकम् तत्वं न गुरुराधिको तपः
तत्व ज्ञानात परम नास्ति तस्मै श्री गुरुवे नमः
मन्नाथः श्री जगन्नाथः मद्गुरुः श्री जगद्गुरु
मदात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः
गुरुरादिर नादिश्च गुरुः परम देवतम
गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्री गुरुवे नमः
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम स्मरामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम नमामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम यजामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम भजामि
ब्रम्हानंदम परम सुखदं केवलम ज्ञान मूर्तिम्
द्वंद्वातीतं गगनं सदृश्यम तत्व मत्स्याधि लक्षम
एकम नित्यं विमल मचलम सर्वाधि साक्षी भूतम्
भावातीतं त्रिगुण रहितम् सद्गुरुम त्वं नमामि
नित्य शुद्धं निराभासम निराकारं निरंजनं
नित्य बोधम् चिदानन्दम् सद्गुरुम त्वं नमाम्यहम
बन्दों गुरुपदकञ्ज कृपा सिंधु नर रूप हरि
महामोह ताम पुंज जासु वचन रविकर निकर
बन्दों गुरुपद पद्म परागा सुरुचि सुवास सरस अनुरागा
अमीय मूरिमय चूरन चारु समन सकल भवरुज परिवारु
सुकृति संभु तन विमल विभूति मंजुल मंगल मोद प्रसूति
जान मन मंजू मुकुर मल हरनी किये तिलक गुनगन बस करनी
श्री गुरु पद नख मणि गण ज्योति सुमिरत विमल दृष्टि हिय होती
उघरहिं विमल विलोचन ही के मिटहि दोष दुःख भव रजनी के
सूझहि राम चरित मणि माणिक गुप्त प्रगट जहं जो जेहि खनिक
जथा सुअंजन अंजि ड्रैग साधक सिद्ध सुजाना
कौतुक देखत सैलबन भूतल भूरि निधान
वन्दे बोध मयम नित्यं गुरुम शंकर रूपिणम्
यमा श्रितोही वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते
ध्यानं मूलम गुरोर्मूर्ति ,पूजा मूलम गुरोर्पदं
मन्त्र मूलम गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलम गुरूर्कृपाः !
आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरुवै नमः
शोषणम् भव सिन्धोश्च ज्ञापनम् सार सम्पदम्
गुरोः पादोदकं सम्यक तस्मै श्री गुरुवे नमः
न गुरुराधिकम् तत्वं न गुरुराधिको तपः
तत्व ज्ञानात परम नास्ति तस्मै श्री गुरुवे नमः
मन्नाथः श्री जगन्नाथः मद्गुरुः श्री जगद्गुरु
मदात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः
गुरुरादिर नादिश्च गुरुः परम देवतम
गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्री गुरुवे नमः
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम स्मरामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम नमामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम यजामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम भजामि
ब्रम्हानंदम परम सुखदं केवलम ज्ञान मूर्तिम्
द्वंद्वातीतं गगनं सदृश्यम तत्व मत्स्याधि लक्षम
एकम नित्यं विमल मचलम सर्वाधि साक्षी भूतम्
भावातीतं त्रिगुण रहितम् सद्गुरुम त्वं नमामि
नित्य शुद्धं निराभासम निराकारं निरंजनं
नित्य बोधम् चिदानन्दम् सद्गुरुम त्वं नमाम्यहम
बन्दों गुरुपदकञ्ज कृपा सिंधु नर रूप हरि
महामोह ताम पुंज जासु वचन रविकर निकर
बन्दों गुरुपद पद्म परागा सुरुचि सुवास सरस अनुरागा
अमीय मूरिमय चूरन चारु समन सकल भवरुज परिवारु
सुकृति संभु तन विमल विभूति मंजुल मंगल मोद प्रसूति
जान मन मंजू मुकुर मल हरनी किये तिलक गुनगन बस करनी
श्री गुरु पद नख मणि गण ज्योति सुमिरत विमल दृष्टि हिय होती
उघरहिं विमल विलोचन ही के मिटहि दोष दुःख भव रजनी के
सूझहि राम चरित मणि माणिक गुप्त प्रगट जहं जो जेहि खनिक
जथा सुअंजन अंजि ड्रैग साधक सिद्ध सुजाना
कौतुक देखत सैलबन भूतल भूरि निधान
वन्दे बोध मयम नित्यं गुरुम शंकर रूपिणम्
यमा श्रितोही वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते
ध्यानं मूलम गुरोर्मूर्ति ,पूजा मूलम गुरोर्पदं
मन्त्र मूलम गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलम गुरूर्कृपाः !
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