आता है वज्द मुझको,हर दीन की अदा पर
मस्जिद में नाचता हूँ ,नाक़ूस की सदा पर
हर धर्म के तरीके पर मुझे आनंद आता है मंदिर में जब शंख बजता है तो मैं मस्जिद में नाच उठता हूँ —अनजान शायर
मस्जिद में नाचता हूँ ,नाक़ूस की सदा पर
हर धर्म के तरीके पर मुझे आनंद आता है मंदिर में जब शंख बजता है तो मैं मस्जिद में नाच उठता हूँ —अनजान शायर
खुद की कसम इन आँखों को रोको
यहाँ दिल की दुनिया लूटी जा रही है
यहाँ दिल की दुनिया लूटी जा रही है
बहन मिल जाए बिजलियों के टूट पड़ने का
कलेजा काँपता है ,आशियां को आशियां कहते —असर लखनवी
कलेजा काँपता है ,आशियां को आशियां कहते —असर लखनवी
तमाम उम्र इसी एहतियात में गुजरी
कि आशियाना कहीं शाखे गुल पे बार न हो —अंजुम नाज़्मी
कि आशियाना कहीं शाखे गुल पे बार न हो —अंजुम नाज़्मी
तारीकी दिल की दूर करने को
तेरी बस एक नज़र काफी है
ये शमा जल रही है क्यों महफ़िल में
तुम्हारे हुस्न की एक किरण काफी है
जहाँ को रोशन करने को ए हमनशीं
तेरे रुखसार की ताबानी काफी है
न बर्क चमकाओ न परेशां करो तुम
बिस्मिलों के लिए एक तबस्सुम काफी है
ज़रुरत नहीं है कि ग़ज़ल तरन्नुम में कहो “बेताब”
आशिक़ों के लिए तेरी खुश बयानी काफी है —सुरेश नामदेव “बेताब”केवलारी
तेरी बस एक नज़र काफी है
ये शमा जल रही है क्यों महफ़िल में
तुम्हारे हुस्न की एक किरण काफी है
जहाँ को रोशन करने को ए हमनशीं
तेरे रुखसार की ताबानी काफी है
न बर्क चमकाओ न परेशां करो तुम
बिस्मिलों के लिए एक तबस्सुम काफी है
ज़रुरत नहीं है कि ग़ज़ल तरन्नुम में कहो “बेताब”
आशिक़ों के लिए तेरी खुश बयानी काफी है —सुरेश नामदेव “बेताब”केवलारी
कभी गैरों पर अपनों का गुमां होता है
कभी अपने भी नज़र आते हैं बेगाने से
कभी ख्वाबों में चमकते हैं मुरादों के महल
कभी महलों में नज़र आते हैं वीराने से !
कभी अपने भी नज़र आते हैं बेगाने से
कभी ख्वाबों में चमकते हैं मुरादों के महल
कभी महलों में नज़र आते हैं वीराने से !
इश्क मुश्क खांसी खुश्क
खैर खून मदपान
इतने छुपाए ना छुपे
ये प्रकट होत निदान
खैर खून मदपान
इतने छुपाए ना छुपे
ये प्रकट होत निदान
नज़र जिसकी तरफ कर के निगाह फेरलेते हो
क़यामत तक फिर उस दिल से परेशानी नहीं जाती !—आनंद नारायण “मुल्ला”
क़यामत तक फिर उस दिल से परेशानी नहीं जाती !—आनंद नारायण “मुल्ला”
उजाला तो हुआ कुछ देर को सहने गुलिस्तां में
बल से बिजलियों ने फूंक डाला आशियाँ मेरा —ग़ालिब
बल से बिजलियों ने फूंक डाला आशियाँ मेरा —ग़ालिब
आग खुद अपने नशेमन को लगा दी मैंने
बर्क़ की ज़िद से गुलिस्तां को बचने के लिए —जॉकी रामपुरी
बर्क़ की ज़िद से गुलिस्तां को बचने के लिए —जॉकी रामपुरी
बर्क़ क्या बर्बाद कर सकती है मेरा आशियाँ
बल्कि यूँ कहिये कि रोशन आशियाँ हो जाएगा !—आसा
बल्कि यूँ कहिये कि रोशन आशियाँ हो जाएगा !—आसा
कौन किसका हबीब होता है
कौन किसका रकीब होता है
वैसे ही बन जाते हैं रिश्ते
जैसा जिसका नसीब होता है
कौन किसका रकीब होता है
वैसे ही बन जाते हैं रिश्ते
जैसा जिसका नसीब होता है
कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊं
कि यह गम तुम्हारी वदीयत है मुझको
न फूलों के झुरमुट में जी मेरा बहला
न रास आई मुझको सितारों की महफ़िल
सुलगती हुई गम की तन्हाइयों में
यही मुझसे कहता है मेरा दुखी दिल
मेरा जीना मारना तुम्हारे लिए था
तुम्ही हो मसीहा तुम्ही मेरे क़ातिल
अभी तक तुम्हे ढूंढती हैं निगाहें
अभी तक तुम्हारी ज़रुरत है मुझको !
कि यह गम तुम्हारी वदीयत है मुझको
न फूलों के झुरमुट में जी मेरा बहला
न रास आई मुझको सितारों की महफ़िल
सुलगती हुई गम की तन्हाइयों में
यही मुझसे कहता है मेरा दुखी दिल
मेरा जीना मारना तुम्हारे लिए था
तुम्ही हो मसीहा तुम्ही मेरे क़ातिल
अभी तक तुम्हे ढूंढती हैं निगाहें
अभी तक तुम्हारी ज़रुरत है मुझको !
इश्क का नशा जब कोई
मर जाए तो जाए
ये दर्दे सर ऐसा है कि
सर जाए तो जाए
मर जाए तो जाए
ये दर्दे सर ऐसा है कि
सर जाए तो जाए
दिल टूटने से तकलीफ तो हुई
मगर उम्र भर का आराम हो गया !
मगर उम्र भर का आराम हो गया !
आने का वादा तो मुंह से निकल गया
पूछी जगह तो कहने लगे ख्वाब में !
पूछी जगह तो कहने लगे ख्वाब में !
दूर हमसे हुए दिल के पास आकर
खाई ठोकर भी तो मंज़िल के पास आकर
देखिये गर्दिशे तकदीर इसे कहते हैं
डूबी कश्ती भी तो साहिल के पास आकर
खाई ठोकर भी तो मंज़िल के पास आकर
देखिये गर्दिशे तकदीर इसे कहते हैं
डूबी कश्ती भी तो साहिल के पास आकर
वो हम रहे ,न वो हालात जिंदगी के रहे
कोई हमारा न रहा हम किसी के न रहे !
कोई हमारा न रहा हम किसी के न रहे !
जला कर मई अपना आशियाँ
जब खाक कर डाला
जगह दे दी है मुझको दिलबर ने
अपने दिल में रहने की
जब खाक कर डाला
जगह दे दी है मुझको दिलबर ने
अपने दिल में रहने की
गिला करते हो क्यों तुम मौत से जो बेतकल्लुफ है
वो खुद आ जाएगी इक दिन पैगाम से पहले
वो खुद आ जाएगी इक दिन पैगाम से पहले
अब तो न ख़ुशी का गम है
न गम की ख़ुशी मुझे
बेबस बना चुकी है बहुत
जिंदगी मुझे
न गम की ख़ुशी मुझे
बेबस बना चुकी है बहुत
जिंदगी मुझे
मेरी कब्र पर कोई आये क्यों
आकर शमा जले क्यों
मैं तो बेकसी की मज़ार हूँ
कोई फूल मुझपे चढ़ाए क्यों
आकर शमा जले क्यों
मैं तो बेकसी की मज़ार हूँ
कोई फूल मुझपे चढ़ाए क्यों
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