बेजुबान -------------------
मैंने महसूस की है,
बेबसी बेजुबानो की,
ना वो महफूज़ हैं जंगलों में,
ना बस्तियों में इत्मिनान है।
महज खालों के लिये,
सींगों के लिए,
बरसों से होते आए हैं ,
इंसानी वहाशीयत का शिकार।
जिन्हें पाला उसने मतलब से,
कभी नाक में नकेल डाल कर,
कभी गर्दन में जुआ पहना कर,
चाबुक,हंटर मार मार कर।
उसे सदा जोतता रहा,
बोझ पर बोझ लादता रहा,
आधा पेट चारा खिला कर,
मृत्यु तक बंधक वह जानवर।
या शायद मृत्यु से कुछ पहले,
जब हो जाता है बूढा लाचार,
उसे कसाई को बेचता,
वह शैतान दावेदार।
इसी तरह होते ही रहते,
हिन् मासूमों पर ज़ुल्म सितम,
क़त्ल कभी मज़हब के नाम,
और कभी मनौती नाम।
बहता खून,
बिखरती हड्डियाँ,
और आदमी पचा जाता है,
उनकी बोटियाँ।
मैंने महसूस की है,
बेबसी बेजुबानो की,
ना वो महफूज़ हैं जंगलों में,
ना बस्तियों में इत्मिनान है।
महज खालों के लिये,
सींगों के लिए,
बरसों से होते आए हैं ,
इंसानी वहाशीयत का शिकार।
जिन्हें पाला उसने मतलब से,
कभी नाक में नकेल डाल कर,
कभी गर्दन में जुआ पहना कर,
चाबुक,हंटर मार मार कर।
उसे सदा जोतता रहा,
बोझ पर बोझ लादता रहा,
आधा पेट चारा खिला कर,
मृत्यु तक बंधक वह जानवर।
या शायद मृत्यु से कुछ पहले,
जब हो जाता है बूढा लाचार,
उसे कसाई को बेचता,
वह शैतान दावेदार।
इसी तरह होते ही रहते,
हिन् मासूमों पर ज़ुल्म सितम,
क़त्ल कभी मज़हब के नाम,
और कभी मनौती नाम।
बहता खून,
बिखरती हड्डियाँ,
और आदमी पचा जाता है,
उनकी बोटियाँ।
हमजोली-------------------
उम्र भर चलती रही,
यात्रा भी रही अनवरत,
जानी पहचानी राहों पर,
अनदेखी अनजानी राहों पर।
जाने कितने मिले पड़ाव,
सहयात्री भी कई मिले,
कितने ही बने मित्र,सुमित्र,
चले साथ जो कदम दो कदम।
कुछ जीवित हैं स्मृतियों में,
कुछ पड़ गए हैं धूमिल,
खो गए जाने कहाँ ,
कितना बड़ा है यह जहाँ?
इतनी लम्बी इस यात्रा में,
कभी नहीं टकराया कोई,
जाना पहचान सा चेहरा,
या बचपन का हमजोली।
यदि कभी मिल जाता कोई,
कुछ कहती कुछ सुनती उससे,
बांट लेती मैं उसके साथ,
स्मृतियाँ खट्टी मीठी।
ऐसा क्यों लगता है मानो,
समय के हिसाब में से ही,
गुम हो गया वह पन्ना,
क्यों लगता है ज्यों सपना।
अभिसार----------------------------------
हर सुबह धुली धुली सी,
स्वच्छ रजत रश्मियों से भरी,
हर रात चाँद सितारों से जड़ी,
आकाश इंद्र धनुष से सजा।
हरे भरे पेड़,
दूर दूर तक लहलहाते खेत,
धरती,हरे भरे गलीचे सी बिछी,
पक्षियों का कलरव।
नदियों का कल कल निनाद,
और झरने का मधुर संगीत,
तपती हुयी गर्मियोंमे ,
चलती मंद मंद मलायानील।
शुष्क अधरों पर,
वर्षा की बूंदों के टपकने का आभास,
रुई के गालों सी गिरती बर्फ,
और सर्दियों की नर्म धूप ।
और उसमे अलसाए से तन,
और बंद आँखों में गहन संतोष,
माँ की गोद में सर रखे,
सो रहा शिशु मय परितोष।
स्वच्छ रजत रश्मियों से भरी,
हर रात चाँद सितारों से जड़ी,
आकाश इंद्र धनुष से सजा।
हरे भरे पेड़,
दूर दूर तक लहलहाते खेत,
धरती,हरे भरे गलीचे सी बिछी,
पक्षियों का कलरव।
नदियों का कल कल निनाद,
और झरने का मधुर संगीत,
तपती हुयी गर्मियोंमे ,
चलती मंद मंद मलायानील।
शुष्क अधरों पर,
वर्षा की बूंदों के टपकने का आभास,
रुई के गालों सी गिरती बर्फ,
और सर्दियों की नर्म धूप ।
और उसमे अलसाए से तन,
और बंद आँखों में गहन संतोष,
माँ की गोद में सर रखे,
सो रहा शिशु मय परितोष।
मनमोहन----------------------------------
मेरा मन हो या तेरा मन,
किसने देखा कैसा है मन,
जैसे प्रभु की थाह नहीं है,
चलती जैसे मंद पवन।
आचार अलग विचार अलग,
और कृत्य भी अलग अलग,
शेष शरीर हो भले एक सा,
अलग अलग हर तन एक मन।
विज्ञान कहता दिल ही मन है,
या मस्तिष्क को कहते मन?
चीरफाड़ की जाती इसकी,
प्रत्यारोपित होता मन?
हर्ष से हर्षित हो जाता है,
और प्रफुल्लित होता मन,
अत्यधिक हर्षित जब होता,
आल्हादित हो जाता मन।
वर्षा की टिप टिप सुन सुन कर,
प्रेमीयुगल है प्रेम मगन,
किन्तु वही टिप टिप क्यों होती,
विरही जन की प्रेम अगन?
धानी चुनरिया ओढ़ के वसुधा,
दिखती है जैसे दुल्हन,
काया कल्प देख के उसका,
कृषक पुत्र है स्मित वदन।
चारों ओर छाई हरितिमा ,
वृक्षों से वन हुए सघन,
कृत कृत्य हो जाता मानव,
हर्षाता तब है पशुधन।
माली करता वृक्षारोपण,
देखभाल में रहे मगन,
सारी क्यारी सारा बाग़,
खिल उठते चंहू ओर सुमन।
छत पर तड तड पड़ती है,
आंगन में छप छप का स्वर,
पत्तों से छनती झर झर ,
विस्मित करता इन्द्र्वादन।
कभी कभी होती है धीमी,
और कभी होती घनघोर,
बीच बीच में चमक दामिनी,
मेघ कभी करते गर्जन,
झूले पड़ते हैं पेड़ों पर,
हँसी ठिठोली,अठखेली,
सखी सहेली अलबेली से,
करती है बगिया गुंजन,
मेघ देख कर हर्षित होता,
मुदित मयूर कोलाहल करता,
हर्षातिरेक जब हो जाता,
करने लगता है नर्तन।
कलरव करते पक्षी गण ,
पुष्पित पल्लवित होते वृक्ष,
नेत्रों में छाया आनंद,
चहूं ओर हर्षित हैं जन।
बेटी और बहन को न्योता,
उल्लसित हैं उनके मन,
आतुर हो जाती मिलने को,
आए जब रक्षा बंधन।
प्रेमी मन लेते अंगडाई,
चाहे हो कितनी रुसवाई,
कहीं प्रेम का सुखद अंत,
और कहर कहीं बनता यौवन।
क्षुधित धरा की प्यास बुझाता,
दीर्घ प्रतीक्षा हुई सफल,
झुलस रहे पेड़ों पौधों की,
समाप्त प्राय हो जाए तपन।
दीर्घ प्रतीक्षा के पश्चात,
होता जिसका है स्वागत,
क्षुधित धरा को पिला रहा जल,
अदभुत मनमोहक सावन।
दोराहा------------------------------
हर दिन हर वक़्त एक दोराहे
पर खड़ा रहता है इंसान,
खुद को बड़ी कश्मकश में,
पड़ा पाता है इंसान।
यह करूँ या वह करूँ,
जाऊं इधर या उधर जाऊं,
वहां खड़ा,
यही सोचता रहता है इंसान।
फैसला करने तक का वक़्त,
बड़ी मुश्किल से काटता है इंसान,
थोड़ी दूर चल कर,खुश हो जाता है कभी,
कभी बहुत पछताता है इंसान।
ख़ुशी घडी दो घडी की,
महसूस भी कर नहीं पाता ,
की फिर से अपनेआप को,
एक नए दोराहे पर खड़ा पाता है इंसान।
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