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शुक्रवार, 6 मार्च 2020

Halahal Se : By Nirupama Sinha !! Tum Aur Main !!{1}

तुम और मैं-----------------
प्रभु तेरी सृष्टि है सुन्दर,
बनी जा रही बड़ी असुंदर,
तू ही इसका राखनहार,
चाहे तू,तो रहे निरंतर।
आते हैं भूकंप बराबर,
धरती के सारे ही छोर,
बाढ़ और तूफ़ान भी अब,
मचा  रहे विनाश का शोर।
पर्वतों से गिरे शिलाखंड,
अक्सर होते भूस्खलन,
हजारों हो जाते  हैं बेघर,
या मृत्यु करती है आलिंगन।
तुम हो परमपिता परमात्मा,
अंश तुम्हारा है आत्मा,
ज्यादातर क्यों खल ही दिखते,
कुछ ही बन पते महात्मा।
हरिश्चन्द्र सा सत्य वदन,
रामचंद्र सा आज्ञाकारी,
कर्ण सा कोई दानवीर,
क्यों ना दूजा हुआ कोई गाँधी।
तू ही विधि तू ही विधान,
विधाता तू हम तो अनजान ,
अलग अलग क्यों सबका जीवन,
कोई भागसुभाग ,कोई कर्म प्रधान।
जब देखूं लक्ष्मी की माया,
घाघ चतुर अपराधी द्वार,
होता मन चकित आशंकित,
मुझसे तो दूर रही छाया।
रुपयों की रेलमपेल कहीं,
कुबेर द्वार पर लक्ष्मी खड़ी,
और कहीं पर निर्धनता,
वर्षों से है अडी  पड़ी।
कोई यत्न निरंतर करता,
निष्ठा पूर्वक करता काज,
सहज ही दूजा अर्जित करता,
धन संपत्ति और साम्राज्य।
अच्छे पीछे क्यों रह जाते,
खल क्यों आगे बढ़ जाते हैं,
मेरे मन में द्विविधा भारी ,
सब अलग अलग फल क्यों पाते हैं।
लिखते हो तुम सबका भाग्य,
रचते तुम ही सबका जीवन,
कहाँ जन्म कैसे हों कर्म,
कहीं सौभाग्य कहीं दुर्भाग्य।
क्या सच है कोई पिछला जन्म?
उस जन्म में किये सारे कर्म?
सुख दुःख क्या है उसके अनुरूप?
योनि,जीवन और नवजन्म?
खल का जीवन खिलती धूप ,
खुशियाँ दिखती चारों ओर ,
निर्धन के घर छाया तम,
दुःख इस ओर ,दुःख उस ओर।
भाग्य को कोसा करता मानव,
जब जीवन में होता असफल,
अथवा यह समझाता निज को,
यह है पूर्व के कर्मों का फल।
क्या ऊपर हैं स्वर्ग नर्क?
वहां क्या होता सच्चा न्याय?
अच्छे पाते पुण्य लाभ और,
खल लाचार और निरुपाय?
सम्पूर्ण जगत का तू स्वामी,
हम सब हैं तेरी संतान,
दुःख से व्यथित हम तेरे अंश,
क्यूँ दुःख पायें दया निधान?
मेरे दुःख का करो निवारण,
जटिलताओं का सही निराकरण,
करो समाप्त दुखों के कारण,
कहाँ जाऊं छोड़ तुम्हारी शरण।
आँख से आंसू  झर झर झरते,
कलम से झरते शब्द विशेष,
सूखे अधरों पर निश्वास,
पूजा में अब क्या है शेष?
मंदिर में घंटे घड़ियाल,
चन्दन पुष्प बन्दनवार,
ढेर चढ़ावा ढेर प्रसाद,
शब्दों की मेरी सौगात।
ना जानू पूजा कैसी हो,
ना जानू भक्ति हो कैसी,
मैं तो बस इतना ही जानू ,
तुम मातपिता चाहे मैं जैसी।
विलगित हूँ जब तक है जीवन,
करूँ कर्म मैं आजीवन,
मरणोपरांत हूँ तुझमे लीन ,
रखते क्यों हो मुझे उपेक्षित?
तेरा मेरा यह सम्बन्ध,
यह है अटूट और निर्द्वंद ,
मैं क्यों इतने कष्टों में हूँ ?
तेरी क्यों हैं आँखें बंद?
अमर तुम्हारा है सन्देश,
कोई नहीं किसीका जग में,
पुत्र पति या बंधु बांधव,
गीता का सत्य सकल उपदेश।
कर्म करो यह गीता ज्ञान,
कर्मठ करते कर्म का मान,
किन्तु जब राह कठिन हो भारी,
तेरा ही तो आए ध्यान।
मानव क्यों भूला रहता है,
कर्म नहीं दुष्कर्म करता है,
किसके हेतु जोड़ रहा धन?
जब कि मृत्यु है पटाक्षेप।
जब तक जीवन तब तक माया,
यह ना हो यह बात असंभव,
कर्तव्यों का निर्वाह निरंतर,
विमुख हो सके,यह ना संभव।
तुम ना क्यों दिखाई पड़ते?
क्यों बैठे रहते चुपचाप?
कभी कभी मन संशय करता,
हिलने लगता तब विश्वास।
मैंने कस कर पकड़ रखी है,
प्रभु तेरे विश्वास की डोर,
कभी इसे तुम छोड़ न देना,
तुम ही तो बैठे उस ओर।
यहाँ नहीं कोई है मेरा,
भाई बंधु या रिश्तेदार,
तुम पर हम सारे निर्भर,
कर दो भवसागर के पार।
---------------------------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}

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