तुम और मैं---------------------------
कण कण में तुम हो व्यापक,
हर घटना के तुम निर्णायक,
तुम्हरे बिन ना पत्ता हिलता,
तुम ही सृष्टि के संस्थापक।
मैं तो हूँ अत्यंत अकिंचन,
ना ही कोई है अस्तित्व,
क्षण भंगूर से जीवन तक ,
जीवित रहता एक अस्तित्व।
तुम सर्वज्ञ तुम हो परम,
न्याय तुम्हारा है अनुपम,
समतुल्य तुम्हारे हर जीवन,
राजा हो चाहे निर्धन।
मैं हूँ मानव मनु का वंश,
मेरे अंतर सत्य भलाई,
कर्मठता का है एक अंश,
किन्तु बुराई भी ज्यों दंश।
तुम पूजे जाते हो हर मन ,
धारे तुमने रूप अनेक,
अलग अलग हैं आराधन,
पर रूप तुम्हारा केवल एक।
पूजा की बदल गई परिभाषा,
मानवता का खो गया स्थान,
नृशंस हत्या और कीर्तन भजन?
निरीह जीव बनते भोजन।
भावना और बुद्धि का दान,
देकर अनुपम दो वरदान,
तूने तो भेजा था इसको,
करने जीवों का कल्याण।
काट काट जीवों को खाकर,
कर दिया है चौथाई अनुपात,
पेड़ काट वासुद पर करता ,
संघातिक से नित आघात।
वायु मंडल को किया प्रदूषित,
नीचे होता जल का स्तर ,
शुष्क हो रहीं नदियाँ सारी ,
बने जा रहे वन बंजर।
दुर्घटनाओं में जब मरते,
निरीह पशु पक्षी या मानव,
तब तब मैं बस यही विचारूं ,
क्यों यह बना जा रहा दानव।
सवारी की गति तीव्रतम,
जाना इसे है शीघ्रतम,
प्राणों की ले रहा आहूति ,
यह स्वयं बना हुआ है यम।
मानवीयता अब नहीं यथार्थ,
संवेदना हो गई कालातीत,
दुर्घटना में मरे पशु भी,
सड़ गल कर हों वहीँ समाप्त।
ये बातें पढ़ सुन कर मन में,
आए वितृष्णा वीतराग,
लेकिन मेरे जैसे कितने,
जिनको होता यह आभास।
प्रभु मैं हूँ कितनी विवश,
सब कुछ है तेरे ही वश,
लाचार निरीह मूक पशु पक्षी,
क्यूँ मारे जाते रात्र दिवस।
नानक बुद्ध और कबीर,
शिक्षा से उनके बहे रुधीर ,
मानव का यह रूप देख कर,
कैसे रख पाए मन धीर।
इस धरती पर कितने दुःख हैं,
जित जाओ तित दुःख ही दुःख है,
अज्ञानी दिगभ्रमित हैं सारे,
सबसे बड़ा यही बस दुःख है।
सिद्दार्थ ने जब देखे,
अपाहिज कोढ़ी और श्मशान,
व्यथित हुए मन उनका रोया,
प्राप्त हुआ एक अंतरज्ञान।
बोधी वृक्ष की शीतल छाया,
सत्य सत्व जीवन का पाया,
मृत्यु सत्य और जीवन झूठा,
जनमानस को यह समझाया।
विनष्ट कर रहा है यह सृष्टि,
जनसंख्या की करता वृद्धि,
अपने पाँव कुल्हाड़ी मारे,
कैसा है मानव दुर्बुद्धि।
समाप्त हो रहा संतुलन,
घटते वृक्ष बढे जा रहे जन,
संकट में है सार पशुधन,
विनाशोन्मुख ,बढ़ता असंतुलन।
--------------------------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
कण कण में तुम हो व्यापक,
हर घटना के तुम निर्णायक,
तुम्हरे बिन ना पत्ता हिलता,
तुम ही सृष्टि के संस्थापक।
मैं तो हूँ अत्यंत अकिंचन,
ना ही कोई है अस्तित्व,
क्षण भंगूर से जीवन तक ,
जीवित रहता एक अस्तित्व।
तुम सर्वज्ञ तुम हो परम,
न्याय तुम्हारा है अनुपम,
समतुल्य तुम्हारे हर जीवन,
राजा हो चाहे निर्धन।
मैं हूँ मानव मनु का वंश,
मेरे अंतर सत्य भलाई,
कर्मठता का है एक अंश,
किन्तु बुराई भी ज्यों दंश।
तुम पूजे जाते हो हर मन ,
धारे तुमने रूप अनेक,
अलग अलग हैं आराधन,
पर रूप तुम्हारा केवल एक।
पूजा की बदल गई परिभाषा,
मानवता का खो गया स्थान,
नृशंस हत्या और कीर्तन भजन?
निरीह जीव बनते भोजन।
भावना और बुद्धि का दान,
देकर अनुपम दो वरदान,
तूने तो भेजा था इसको,
करने जीवों का कल्याण।
काट काट जीवों को खाकर,
कर दिया है चौथाई अनुपात,
पेड़ काट वासुद पर करता ,
संघातिक से नित आघात।
वायु मंडल को किया प्रदूषित,
नीचे होता जल का स्तर ,
शुष्क हो रहीं नदियाँ सारी ,
बने जा रहे वन बंजर।
दुर्घटनाओं में जब मरते,
निरीह पशु पक्षी या मानव,
तब तब मैं बस यही विचारूं ,
क्यों यह बना जा रहा दानव।
सवारी की गति तीव्रतम,
जाना इसे है शीघ्रतम,
प्राणों की ले रहा आहूति ,
यह स्वयं बना हुआ है यम।
मानवीयता अब नहीं यथार्थ,
संवेदना हो गई कालातीत,
दुर्घटना में मरे पशु भी,
सड़ गल कर हों वहीँ समाप्त।
ये बातें पढ़ सुन कर मन में,
आए वितृष्णा वीतराग,
लेकिन मेरे जैसे कितने,
जिनको होता यह आभास।
प्रभु मैं हूँ कितनी विवश,
सब कुछ है तेरे ही वश,
लाचार निरीह मूक पशु पक्षी,
क्यूँ मारे जाते रात्र दिवस।
नानक बुद्ध और कबीर,
शिक्षा से उनके बहे रुधीर ,
मानव का यह रूप देख कर,
कैसे रख पाए मन धीर।
इस धरती पर कितने दुःख हैं,
जित जाओ तित दुःख ही दुःख है,
अज्ञानी दिगभ्रमित हैं सारे,
सबसे बड़ा यही बस दुःख है।
सिद्दार्थ ने जब देखे,
अपाहिज कोढ़ी और श्मशान,
व्यथित हुए मन उनका रोया,
प्राप्त हुआ एक अंतरज्ञान।
बोधी वृक्ष की शीतल छाया,
सत्य सत्व जीवन का पाया,
मृत्यु सत्य और जीवन झूठा,
जनमानस को यह समझाया।
विनष्ट कर रहा है यह सृष्टि,
जनसंख्या की करता वृद्धि,
अपने पाँव कुल्हाड़ी मारे,
कैसा है मानव दुर्बुद्धि।
समाप्त हो रहा संतुलन,
घटते वृक्ष बढे जा रहे जन,
संकट में है सार पशुधन,
विनाशोन्मुख ,बढ़ता असंतुलन।
--------------------------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
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