हलाहल-------
कैसे चोरी करें टैक्स की,
कैसे कैसे लाभ हो ज्यादा,
कैसे ग्राहक की जेबों से,
नोट निकले जाएँ ज्यादा।
देश से देशवासी से छल,
स्वयं से भगवान् से छल,
बना रहे ये सारे मिलकर,
देश को भ्रष्टाचार का दलदल।
धनपतियों का जीवन तो,
बस है आडम्बर,ही आडम्बर,
मित्र नहीं कोई है इनका,
मुस्काते ये ऊपर ऊपर।
जान नहीं सकता है कोई,
क्या है इनके मन के अन्दर,
क्या पकता रहता है हरदम,
चतुर चालाक मस्तिष्क के अन्दर।
कोई कष्ट नहीं है क्योंकि,
इनकी तो एक जेब में नेता,
और दूसरी में चुपके से ,
बैठा रहता है कानून।
पाते ये पल भर में सबकुछ,
नोटों की तो हरियाली है,
इनका होता हरदिन उत्सव,
और हर रात दिवाली है।
कैसे चोरी करें टैक्स की,
कैसे कैसे लाभ हो ज्यादा,
कैसे ग्राहक की जेबों से,
नोट निकले जाएँ ज्यादा।
देश से देशवासी से छल,
स्वयं से भगवान् से छल,
बना रहे ये सारे मिलकर,
देश को भ्रष्टाचार का दलदल।
धनपतियों का जीवन तो,
बस है आडम्बर,ही आडम्बर,
मित्र नहीं कोई है इनका,
मुस्काते ये ऊपर ऊपर।
जान नहीं सकता है कोई,
क्या है इनके मन के अन्दर,
क्या पकता रहता है हरदम,
चतुर चालाक मस्तिष्क के अन्दर।
कोई कष्ट नहीं है क्योंकि,
इनकी तो एक जेब में नेता,
और दूसरी में चुपके से ,
बैठा रहता है कानून।
पाते ये पल भर में सबकुछ,
नोटों की तो हरियाली है,
इनका होता हरदिन उत्सव,
और हर रात दिवाली है।
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