बरसों गरीब गरीब ही रहा,
सुनते सुनते एक नारा ,
गरीबी हटाओ ,गरीबी हटाओ,
नारा रह गया बस नारा।
अनपढ़ और अशिक्षित जनता,
पहुँच से बड़ी दूर थे नेता,
दोनो बरसों तक करते रहे,
बस अपने ही अपने मन की।
इससे कर्ज ,उससे कर्ज,
विश्व बैंक से लेता कर्ज,
चारों ओर थी घोर गरीबी,
अज्ञान अशिक्षा थी एक तर्ज।
भव्य महत्ता है प्राचीन,
प्रगति पथ पर अर्वाचीन,
तीव्र गति को रोक रही है,
भ्रष्टाचारों की संगीन।
अर्ध शताब्दी से पहले,
जन्म हुआ,फूला और फला ,
भ्रष्टाचार का फन फैलाए ,
नाग है विषधर और काला।
इतनी लम्बी आजादी में,
फ़ैल गए ये चारों ओर ,
जहरीली विषाक्त बेल से,
लिपट गए हैं पोर पोर।
सच्चाई भी पकड़ ना सकी,
इनका ओर न कोई छोर,
खाते रहे अब भी खा रहे,
भ्रष्टाचार की पकड़ के डोर।
कल और आज में इतना अंतर,
ढका छुपा कल आज उजागर,
कल तक था ज्यादा संरक्षण,
रक्षक बन कर ज्यादा भक्षण।
इन्हें नहीं कानून का डर ,
आत्मा और भगवान का डर ,
खाते हैं बेईमानी की रोटी,
ये निर्लज्ज ये लतखोर।
अख़बारों के मुखपृष्ठ पर,
नित्य खुलें नए भ्रष्टाचार,
पहले चौंकाते थे सबको,
दिनचर्या से अब,रहे निहार।
सब कुछ सह लेने की आदत,
बन चुकी है यह अब एक स्वभाव,
महंगाई घोटाले दंगे,
देख रहे हम निष्प्रभाव।
बिजली गुल,किल्लत पानी की,
उबड़ खाबड़ सड़कें सारी ,
जनता का धन खा गए सारे,
जनता हतप्रभ है बेचारी।
ऊपर से नीचे आते आते,
हो जाता धन सभी समाप्त,
विकास हेतु और जनता के हित,
जो मिलता वह अपर्याप्त।
अब क्यों सहते सब अन्याय,
क्यों ना करते कोई उपाय,
आपस में सब चर्चा करते,
व्यर्थ,निरर्थक और निरुपाय।
कहाँ गए वे युवा जुझारू,
भारत माँ के पूत सुर्खरू,
नींद उड़ा दी चैन को लूटा,
किया अंग्रेजों की नाक में दम।
पाप की रोटी पाप का धन,
क्या बसता है तुम्हारे आँगन?
स्वयं से पूछो,स्वयं बताओ,
न्यायाधीश बन करो हनन।
नहीं पचा है,नहीं पचेगा,
गलत कमाई ,काला धन,
धूल आत्मा की अब तुम पोंछो,
इसे बना लो एक दर्पण।
अब तक यदि बच गए भी हो तो,
यह ना समझो सदा बचोगे,
आज नहीं तो, खुल जायेगा कल,
जो रहस्य है पट के अंदर।
यदि तुम भी शामिल हो इसमें,
इसी वक़्त ही करो किनारा,
पकड़ो पकडाओ इनको तुम,
तभी पूर्ण कर्तव्य तुम्हारा।
काम एक है नाम अनेक,
जुर्म एक,और ढंग अनेक,
सुनकर,पढ़ कर भूल जाएं ,
क्या यह सही है?क्या है नेक?
दिल करता है बीच चौराहे,
मारें जूतों की फिटकार,
जुर्म बड़ा संगीन है इनका,
करना होगा तार तार।
मुझको तो आती है घिन,
क्या तुमको बदबू प्यारी है?
आओ मिल सब इसे बुहारें,
करें सफाई देश सवाँरे।
अच्छाई क्या बिलकुल कोरी?
सच्चाई क्या बेचारी है?
नपुंसक क्या हैं सारे ही?
या जिम्मेदारी नहीं हमारी?
जान रही, क्या सोच रहे हो,
हर्षित होकर इसे पढोगे,
प्रशंसा मिश्रित शब्द भी कहोगे,
किन्तु अनुकरण नहीं करोगे।
फेंकोगे यह संस्करण,
उपेक्षित,किसी कोने में आँगन,
किन्तु मेरा है यही वचन,
जगाएगा यह अंतर्मन।
भूल न पाओगे इसको तुम,
जो हैं मेरे व्याक्य वचन,
रह रह कर उकसायेंगे ये,
तुमको करते आवाहन।
झिंझोड़े झकझोरेगा ,
यदि कोई है काला धन,
बार बार प्रेरित करेगा,
मन और तुम्हारा अंतर्मन।
हर व्यक्ति को होना होगा ,
कर्तय निष्ठ और जागरूक,
मिट जाएगी स्वतः बुराई ,
जब बने पारदर्शी,हर रूप।
जब होगी प्रगति प्रति व्यक्ति,
वह परिचायक राष्ट्र की शक्ति,
सब खुश,तभी देश खुशहाल,
यही पुरातन है एक सूक्ति।
----------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
सुनते सुनते एक नारा ,
गरीबी हटाओ ,गरीबी हटाओ,
नारा रह गया बस नारा।
अनपढ़ और अशिक्षित जनता,
पहुँच से बड़ी दूर थे नेता,
दोनो बरसों तक करते रहे,
बस अपने ही अपने मन की।
इससे कर्ज ,उससे कर्ज,
विश्व बैंक से लेता कर्ज,
चारों ओर थी घोर गरीबी,
अज्ञान अशिक्षा थी एक तर्ज।
भव्य महत्ता है प्राचीन,
प्रगति पथ पर अर्वाचीन,
तीव्र गति को रोक रही है,
भ्रष्टाचारों की संगीन।
अर्ध शताब्दी से पहले,
जन्म हुआ,फूला और फला ,
भ्रष्टाचार का फन फैलाए ,
नाग है विषधर और काला।
इतनी लम्बी आजादी में,
फ़ैल गए ये चारों ओर ,
जहरीली विषाक्त बेल से,
लिपट गए हैं पोर पोर।
सच्चाई भी पकड़ ना सकी,
इनका ओर न कोई छोर,
खाते रहे अब भी खा रहे,
भ्रष्टाचार की पकड़ के डोर।
कल और आज में इतना अंतर,
ढका छुपा कल आज उजागर,
कल तक था ज्यादा संरक्षण,
रक्षक बन कर ज्यादा भक्षण।
इन्हें नहीं कानून का डर ,
आत्मा और भगवान का डर ,
खाते हैं बेईमानी की रोटी,
ये निर्लज्ज ये लतखोर।
अख़बारों के मुखपृष्ठ पर,
नित्य खुलें नए भ्रष्टाचार,
पहले चौंकाते थे सबको,
दिनचर्या से अब,रहे निहार।
सब कुछ सह लेने की आदत,
बन चुकी है यह अब एक स्वभाव,
महंगाई घोटाले दंगे,
देख रहे हम निष्प्रभाव।
बिजली गुल,किल्लत पानी की,
उबड़ खाबड़ सड़कें सारी ,
जनता का धन खा गए सारे,
जनता हतप्रभ है बेचारी।
ऊपर से नीचे आते आते,
हो जाता धन सभी समाप्त,
विकास हेतु और जनता के हित,
जो मिलता वह अपर्याप्त।
अब क्यों सहते सब अन्याय,
क्यों ना करते कोई उपाय,
आपस में सब चर्चा करते,
व्यर्थ,निरर्थक और निरुपाय।
कहाँ गए वे युवा जुझारू,
भारत माँ के पूत सुर्खरू,
नींद उड़ा दी चैन को लूटा,
किया अंग्रेजों की नाक में दम।
पाप की रोटी पाप का धन,
क्या बसता है तुम्हारे आँगन?
स्वयं से पूछो,स्वयं बताओ,
न्यायाधीश बन करो हनन।
नहीं पचा है,नहीं पचेगा,
गलत कमाई ,काला धन,
धूल आत्मा की अब तुम पोंछो,
इसे बना लो एक दर्पण।
अब तक यदि बच गए भी हो तो,
यह ना समझो सदा बचोगे,
आज नहीं तो, खुल जायेगा कल,
जो रहस्य है पट के अंदर।
यदि तुम भी शामिल हो इसमें,
इसी वक़्त ही करो किनारा,
पकड़ो पकडाओ इनको तुम,
तभी पूर्ण कर्तव्य तुम्हारा।
काम एक है नाम अनेक,
जुर्म एक,और ढंग अनेक,
सुनकर,पढ़ कर भूल जाएं ,
क्या यह सही है?क्या है नेक?
दिल करता है बीच चौराहे,
मारें जूतों की फिटकार,
जुर्म बड़ा संगीन है इनका,
करना होगा तार तार।
मुझको तो आती है घिन,
क्या तुमको बदबू प्यारी है?
आओ मिल सब इसे बुहारें,
करें सफाई देश सवाँरे।
अच्छाई क्या बिलकुल कोरी?
सच्चाई क्या बेचारी है?
नपुंसक क्या हैं सारे ही?
या जिम्मेदारी नहीं हमारी?
जान रही, क्या सोच रहे हो,
हर्षित होकर इसे पढोगे,
प्रशंसा मिश्रित शब्द भी कहोगे,
किन्तु अनुकरण नहीं करोगे।
फेंकोगे यह संस्करण,
उपेक्षित,किसी कोने में आँगन,
किन्तु मेरा है यही वचन,
जगाएगा यह अंतर्मन।
भूल न पाओगे इसको तुम,
जो हैं मेरे व्याक्य वचन,
रह रह कर उकसायेंगे ये,
तुमको करते आवाहन।
झिंझोड़े झकझोरेगा ,
यदि कोई है काला धन,
बार बार प्रेरित करेगा,
मन और तुम्हारा अंतर्मन।
हर व्यक्ति को होना होगा ,
कर्तय निष्ठ और जागरूक,
मिट जाएगी स्वतः बुराई ,
जब बने पारदर्शी,हर रूप।
जब होगी प्रगति प्रति व्यक्ति,
वह परिचायक राष्ट्र की शक्ति,
सब खुश,तभी देश खुशहाल,
यही पुरातन है एक सूक्ति।
----------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
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