उत्खनन-----
कोई समझाए जा उनको,
लाभ न कोई कर तकरार,
चलना है विकास पथ पे यदि ,
छोडो रार ,कर लो प्यार।
शांतिदूत था सदा विश्व में,
अब भी हैं शांति का वाहक,
भारत सदा बांटता आया,
प्रेम और शांति की सौगात।
भूल चूक को माफ़ करें सब,
मेरे अग्रज मेरे गुरुजन,
आज कर रही मैं अनावरण,
दिखा रही हूँ एक नंगा सच।
नींव सदा बनता अतीत,
अल्प सा ही अंश भले हो,
वर्तमान में सम्मिलित,
शेष हुआ हो काल कवलित।
इतिहास ने किया हमें कभी,
अति हर्षित अति आल्हादित,
और कभी रक्त अश्रुओं ने,
किया धरा को सिंचित प्लावित।
रीति कुरीति परम्पराएँ,
बदली मिटी हुई परिमार्जित,
शासक और प्रशासन तंत्र भी,
समायानुकूल हुए अवस्थित।
क्रूर समय के पंजों ने ,
किया राज रजवाड़ों का अंत,
जनहित जन को जन के द्वारा,
स्थापित हुआ मनमोहक जनतंत्र।
अब ना होगी कोई समस्या,
अब न होगा कोई कष्ट,
लेकिन ले लेकर टिप,हममे से कई,
हो चुके थे पूरे भ्रष्ट।
राजा तब भी थे राजा,
अब जन प्रतिनिधि है राजा ,
राजकोष में मेहनत का धन,
भरती तब से यही प्रजा।
समझ न पाऊं मैं यह भेद,
जन,जनप्रतिनिधि में इतना विभेद,
कल तक उनमे सा था एक,
आज न फुर्सत ना कोई खेद।
-----------निरंतर{कंटीन्यू}
कोई समझाए जा उनको,
लाभ न कोई कर तकरार,
चलना है विकास पथ पे यदि ,
छोडो रार ,कर लो प्यार।
शांतिदूत था सदा विश्व में,
अब भी हैं शांति का वाहक,
भारत सदा बांटता आया,
प्रेम और शांति की सौगात।
भूल चूक को माफ़ करें सब,
मेरे अग्रज मेरे गुरुजन,
आज कर रही मैं अनावरण,
दिखा रही हूँ एक नंगा सच।
नींव सदा बनता अतीत,
अल्प सा ही अंश भले हो,
वर्तमान में सम्मिलित,
शेष हुआ हो काल कवलित।
इतिहास ने किया हमें कभी,
अति हर्षित अति आल्हादित,
और कभी रक्त अश्रुओं ने,
किया धरा को सिंचित प्लावित।
रीति कुरीति परम्पराएँ,
बदली मिटी हुई परिमार्जित,
शासक और प्रशासन तंत्र भी,
समायानुकूल हुए अवस्थित।
क्रूर समय के पंजों ने ,
किया राज रजवाड़ों का अंत,
जनहित जन को जन के द्वारा,
स्थापित हुआ मनमोहक जनतंत्र।
अब ना होगी कोई समस्या,
अब न होगा कोई कष्ट,
लेकिन ले लेकर टिप,हममे से कई,
हो चुके थे पूरे भ्रष्ट।
राजा तब भी थे राजा,
अब जन प्रतिनिधि है राजा ,
राजकोष में मेहनत का धन,
भरती तब से यही प्रजा।
समझ न पाऊं मैं यह भेद,
जन,जनप्रतिनिधि में इतना विभेद,
कल तक उनमे सा था एक,
आज न फुर्सत ना कोई खेद।
-----------निरंतर{कंटीन्यू}
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