*साभार...अन्यत्र से...।*
*लखनऊ में 'विशाल-मुशायरे' का आयोजन किया गया…,*
*देशभर के नामी शायरों ने उस में हिस्सा लिया।उनमें कुछ "हिंदू-शायर" भी थे जिनमें एक नाम था पंडित बृज नारायण "चकबस्त" ।*
*शाम को होने वाले मुशायरे में सुबह से ही देश भर से आए शायर एकत्रित हो चुके थे सभी को उत्कंठा थी कि "फिलबदी-मुशायरे" के लिए कौन सा नया "मिसरा" निकाला गया है…,*
*आखिर वह मिसरा सामने आया…वह मिसरा यह था…,*
*"लोग वो काफिर हैं जो क़ायल नहीं इस्लाम के"।*
*इसका 'साफ-साफ' अर्थ यह था कि जो लोग "इस्लाम" में आस्था नहीं रखते है वे 'क़ाफिर' या 'नास्तिक' हैं।*
*मिसरा सुनकर हिंदू शायर निराश हुए और उनके माथे पर 'उलझन' की लकीरें उभर आई।*
*क्योंकि इस पंक्ति के साथ मिलता जुलता शेर बनाने के लिए निश्चित रूप से उसमें इस्लाम में आस्था की ही बात को आगे बढ़ाना होता...,*
*...लेकिन शाम मुशायरा शुरू होते ही जिन शायरों ने इस पंक्ति के साथ अपने 'शेर' पढ़ने शुरू किए वह करीब करीब एक जैसे ही थे।*
*आखिर में पंडित बृज नारायण "चकबस्त" उठ कर खड़े हुए सबकी निगाहें शायर चकबस्त के चेहरे पर जाकर ठहर गईं...,*
*"सभी सोच रहे थे कि हिंदू शायर होते हुए "चकबस्त" इस्लाम के बारे में क्या कहेंगे ???"*
*लेकिन पंडित बृज नारायण "चकबस्त" के पूरा शेर पढ़ते ही स्टेज पर बैठे सभी शायरों के साथ-साथ पंडाल में चारों तरफ से हिंदू और मुसलमान श्रोताओं की वाह-वाह से पंडाल गूंज उठा...,*
*...न सिर्फ उनके शेर को बेहतरीन शेर का खिताब दिया गया,बल्कि उनको 'मान-सम्मान' से भी नवाजा गया।*
*उन्होने जिस शेर की रचना की उसने एक पंक्ति में कहे गए 'संपूर्ण-विचार' को ही नई दिशा में मोड़ दिया और कुछ इस तरह से पेश किया...,*
*मानिंद हैं "लाम" के…ग़ेसू मेरे घनश्याम के…,*
*...लोग वो "काफिर" हैं जो क़ायल नहीं इस "लाम" के।*
*अब इसके अर्थ को समझते हैं...,*
*शायर ने कहा कि मेरे घनश्याम के ग़ेसू यानी भगवान कृष्ण के जो बालों का आकार है वह उर्दू के अक्षर "लाम" की तरह है , उर्दू की वर्णमाला में जब "लाम" लिखा जाता है तो उसका आकार एक बालों की लट की तरह होता है।*
कुछ इस तरह...
لام کیسے ہے۔
*मेरे कृष्ण के बालों का आकार "लाम" की तरह है और जिन लोगों की इस में आस्था नहीं है,वो लोग 'काफिर' यानि "नास्तिक" हैं।*
*"उस शाम शायर बृज नारायण "चकबस्त" को इस एक शेर के कारण उस मजलिस में सर्वश्रेष्ठ शायर के सम्मान से नवाज़ा गया।"*
*"लाम" के मानिंद हैं ग़ेसू मेरे घनश्याम के*
*लोग वो क़ाफिर हैं जो क़ायल नहीं इस लाम के।*
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें