शिरडी के साईं बाबा पारथी के ब्राह्मण थे। मुस्लिम नाथ योगी से दीक्षित थे। उस समय दत्त भगवान के परम अनुयायी वासुदेवानंद सरस्वती जिन्हें दत्त भगवान से प्रेरणा मिली कि सचल योगी अक्कल कोट के स्वामी समर्थ की शरण में जाओ। वासुदेवानंद सरस्वती ने दत्त भगवान की बहुत सारी योग विधियों एवं उन पर लिखे विलुप्त प्राय साहित्य को ढूँढकर व्यवस्थित किया। वही वासुदेवानंद सरस्वती साईं बाबा से भी मिले और उन्हें योगी माना।
पंडित कविराज गोपीनाथ ने भी अपने समय की विभूतियों में साईं बाबा को माना है और उनसे निर्देश प्राप्त किया है। वर्तमान में उनके चेले और उनका ट्रस्ट क्या करता है, इससे साईं बाबा का कुछ नहीं लेना देना, वो अभाव में ही रहे और उसी में परम गति प्राप्त की।
बालगंगाधर तिलक के सचिव जो साईं बाबा के समकालीन थे और उनके परम अनुयायी थे, उन्होंने अपनी दैनंदिनी में साईं बाबा के प्रसंगों को लिखा है और वो बहुत प्रामाणिक है।
साईं बाबा भगवान नहीं थे किन्तु एक महापुरुष अवश्य थे। उन्होंने योग में इतनी गति पा ली थी कि अपना अंग भंग करके उसे पुनः जोड़ लेते थे और अपनी आंतों को निकाल कर धो लेते थे। जिन्होंने अष्टांग योग और घेरंड संहिता पढ़ी होगी, उन्हें पता होगा कि योग से ये सम्भव है।
कई नाथ योगी मुस्लिम हुये हैं। उनके कई हिन्दू शिष्य हुये हैं, साईं बाबा ऐसे ही थे।
उनको भगवान बनाकर मंदिरों में पूजना उनके अनुयायियों का कार्य है, इसमें उनका कुछ लेना देना नहीं है। आज साईं बाबा के नाम से बहुत बड़ा ट्रस्ट है और उन्हें मुस्लिम कह कह कर हम उन्हें वक्फ बोर्ड की ओर धकेल रहे हैं। आप उनकी पूजा न करें, पर उन्हें गालियां बक कर अपने से दूर न करें।
रही माँस वाली बात तो बंगाल के सिद्ध वामा खेपा के मुँह से कौए और शृगाल माँस नोचकर ले जाते थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद भी मछली खाते थे।
बात समाधि की करें तो संन्यासियों को जलाया नहीं जाता। उन्हें भू समाधि, जल समाधि या वायु समाधि दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपने तप एवं योग के प्रभाव से अपना पाप कर्म नष्ट कर दिया होता है, इसलिये दाहकर्म की उन्हें आवश्यकता नहीं होती।
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