उठा के आईना दिखला दिया उसे मैंने
न सूझी आरिजे गुलगूँ की जब मिसाल मुझे —बर्क़
न सूझी आरिजे गुलगूँ की जब मिसाल मुझे —बर्क़
चमन परास्त हूँ दामन में भर लिए कांटे
न गुल छुआ न किसी गुल का परैहन छेड़ा —असद
न गुल छुआ न किसी गुल का परैहन छेड़ा —असद
ख्वाहिशें सब मिट गयीं ,हसरत हमारी मिट चुकी
मिट गयी खुद से ख़ुशी ,हस्ती हमारी मिट चुकी
हो गया बर्बाद घर ,बस्ती हमारी लूट चुकी
मिट चुके हम खुद में खुद ,साड़ी खुदाई मिट चुकी
मिट गयी खुद से ख़ुशी ,हस्ती हमारी मिट चुकी
हो गया बर्बाद घर ,बस्ती हमारी लूट चुकी
मिट चुके हम खुद में खुद ,साड़ी खुदाई मिट चुकी
अपनी तबाहियों का मुझे कोई गम नहीं
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी —साहिर लुधियानवी
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी —साहिर लुधियानवी
मिटते हुओं को देख कर क्यों रो न दे “मजाज़”
आखिर किसी के हम भी मिटाए हुए तो हैं –“मजाज़”
आखिर किसी के हम भी मिटाए हुए तो हैं –“मजाज़”
इधर न देख मुझे बेकरार रहने दे
मेरी नज़र में मेरा ऐतबार रहने दे —फनी बदायुनी
मेरी नज़र में मेरा ऐतबार रहने दे —फनी बदायुनी
नहीं चाह मेरी अगर उसे नहीं राह दिल में तो किसलिए
मुझे रोते देख वह रो दिया ,मेरा हाल सुन के हुआ क्लक —मोमिन
मुझे रोते देख वह रो दिया ,मेरा हाल सुन के हुआ क्लक —मोमिन
लगता नहीं है दिल मेरा ,उजड़े दयार में ,
उम्र दराज मांग के लए थे चार दिन
दो आरज़ू में काट गए ,दो इंतज़ार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिले दागदार में
इतना है बदनसीब ज़फर दफ्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कूचे यार में —बहादुर शाह ज़फर
उम्र दराज मांग के लए थे चार दिन
दो आरज़ू में काट गए ,दो इंतज़ार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिले दागदार में
इतना है बदनसीब ज़फर दफ्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कूचे यार में —बहादुर शाह ज़फर
बिजलियों से ग़ुरबत में कुछ भरम तो बाकी है
जल गया मकां यानि कोई था मकां अपना
जल गया मकां यानि कोई था मकां अपना
तकमीले बशर नहीं है सुलतान होना
या सफ़ में फ़रिश्ते को नुमाया होना
तकमील है अज्जे बंदगी का एहसास
इंसान की मेराज़ है इन्सां होना –फनी बदायुनी
या सफ़ में फ़रिश्ते को नुमाया होना
तकमील है अज्जे बंदगी का एहसास
इंसान की मेराज़ है इन्सां होना –फनी बदायुनी
हम किया करते हैं अश्कों से तवाजो क्या क्या
जब ख्यालों में वो आ जाते हैं मेहमां की तरह
जब ख्यालों में वो आ जाते हैं मेहमां की तरह
यूँ तेरे माहौल में ढल कर अपना आप भुला बैठा हूँ
जैसे टूटे तारे की लौ जैसे ढलते चाँद के साए —–क़त्ल शिफ़ाई
जैसे टूटे तारे की लौ जैसे ढलते चाँद के साए —–क़त्ल शिफ़ाई
कहीं मज़ाके नज़र को करार मिल न सका
कभी चमन से कभी कहकशां से गुज़रा हूँ
तेरे करीब से गुज़रा हूँ इस तरह कि मुझे
खबर भी न हो सकी मैं कहाँ कहाँ से गुज़रा हूँ —जगन्नाथ आज़ाद
कभी चमन से कभी कहकशां से गुज़रा हूँ
तेरे करीब से गुज़रा हूँ इस तरह कि मुझे
खबर भी न हो सकी मैं कहाँ कहाँ से गुज़रा हूँ —जगन्नाथ आज़ाद
कर न फ़रियाद ख़ामोशी में असर पैदा कर
दर्द बन कर दिले बदर्द में घर पैदा कर
दर्द बन कर दिले बदर्द में घर पैदा कर
तन्हाईए शामे गम के डर से
कुछ उनसे जवाब पा रहा हूँ
लज़्ज़त कश आरज़ू फानी
दानिस्ता फरेब खा रहा हूँ —फनी बदायुनी
कुछ उनसे जवाब पा रहा हूँ
लज़्ज़त कश आरज़ू फानी
दानिस्ता फरेब खा रहा हूँ —फनी बदायुनी
यही ज़िन्दगी मुसीबत यही ज़िन्दगी मसर्रत
यही ज़िन्दगी हक़ीक़त ,यही ज़िन्दगी फ़साना
यही ज़िन्दगी हक़ीक़त ,यही ज़िन्दगी फ़साना
जिसे पा सका न ज़ाहिद जिसे छू सका न सूफी
वही तार छेड़ता है मेरा सोज़े शायराना —जज़्बी
वही तार छेड़ता है मेरा सोज़े शायराना —जज़्बी
ज़िन्दगी उनवाने अफ़साना भी ,अफ़साना भी है
तुझको ए दिल खुद तड़प कर उनको तड़पाना भी है —अर्श मल्शियनि
तुझको ए दिल खुद तड़प कर उनको तड़पाना भी है —अर्श मल्शियनि
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