मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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सोमवार, 19 सितंबर 2016

Sher Behatreen !

जो देखी तारीख,इस बात पर कामिल यकीं आया
उसे जीना नहीं आया जिसे मरना नहीं आया !
पर्दा रहेगा क्यूँकर खुर्शीदे खावरी का
निकले हैं सुबह वो भी अब बेनक़ाब होकर
रवि परदे में सर्वदा रहे असंभव बात
वह भी तो होता प्रकट ज्यों ही हुआ प्रभात
यह मुश्ते ख़ाक यानी इंसान ही है रुक्ष
वर्ना उठाई किनने इस आसमा से टक्कर
प्रतिद्वंद्वी तव दैव है हुआ कौन बलवान
वह मुट्ठी भर खाक ही जिसे कहें इंसान !
जिसे शब आग सा देखा सुलगते
उसे फिर खाक ही पाया सहर को !
शिक़वा – ए – आबला अभी से “मीर”
है प्यारे ! हनोज दिल्ली दूर
पैरों में छाले पड़े ,कहता बड़ी थकान
दिल्ली अभी दूर है ,समझ “मीर” नादान
अक्ल बेचारी दलीलों में फंस कर रह गई
वार्ना उस निगाहे मुख़्तसर में क्या न था !—गुलाम रब्बानी
न पीना हराम है ना पिलाना हराम है
पीने के बाद डगमगाना हराम है !—अनजान शायर
ग़ालिब —
जिंदगी जब रास शलम से गुजारी “ग़ालिब”
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे !
वो आये घर में हमारे ,खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं !
ये न थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता
वो ये कहते हैं कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या ?

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