विक्षोभ ------------------------
नारी का अर्थ है "ना अरि "
शत्रु नहीं कोई हो जिसका,
शेह सिक्त और द्वेष रिक्त,
मित्र हो दुनिया सारी।
प्रभु ने सोचा कैसे जाऊं,
घर घर कैसे स्नेह लुटाऊं,
तब हर घर में जन्मी नारी,
प्रभु की रचना ममता धारी।
जगत जननी जगदम्बा नारी,
माँ भी नारी बहन भी नारी,
पत्नी बेटी दोनों नारी,
जीवन इन बिन साध अधूरी।
दुर्गा की है शेर सवारी,
अंत किये अत्याचारी,
महिषासुर से राक्षस की भी,
देवी दुर्गा है संहारी।
अन्नपूर्णा सी क्षुधा तृप्त कर,
लोरी गति थपकी देती,
कार्य कुशल यह कौशल्या सी,
मित्र है सुमित्रा की सी।
पति को परमेश्वर माना ,
सदा रही अनुगामिनी,
प्राण पति के यम से मांगे,
किसी युग की थी सावित्री।
नारायण से लक्ष्मी पहले ,
राम से पहले सीता नाम,
भजते हैं सारे भक्त गण ,
श्याम से पहले राधा प्यारी।
अनादि प्रभु शिवशंकर के,
उर में बसी सती पार्वती,
महिमामंडन नारी का करने,
बने अर्द्ध नर,और अर्द्ध नारी।
भ्रातृ विरोध को सहकर भी,
देवकी बनी जन्म दायिनी,
पालन पोषण करे यशोदा,
भेद न पाएं कृष्ण मुरारी।
भक्ति रस की बही सरिता,
सुन मीरा की मीठी तान,
कृष्ण नाम के जुड़कर साथ,
अमर हो गई राधा रानी।
किसी कवि ने कभी कहा था,
यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते ,वसन्ते तत्र देवा:
साक्ष्य जिसकी है देवी सीता,
और ममत्व भरी मदर मैरी
छोड़ा राज छोड़ा राजभवन,
छोड़े सब ऐश्वर्य के साधन,
पति के साथ किया वनगमन,
आदर्श बनी मिथिलेश कुमारी।
कष्ट मिले कंटक मिले,
पर्णकुटी में क्या निवास,
हंसते हंसते सहे सभी दुःख,
वन का जीवन था दुःख कारी।
लंका पति घमंडी रावण ,
उठा ले गया कर अपहरण,
राजसुता और राजपुत्रवधु,
सुकुमारी सी जनक दुलारी।
सतीत्व से की चरित्र सुरक्षा,
फिर भी वह संदेह से घिरी,
देकर अग्नि परीक्षा उसने,
सिद्ध किया कि वह है खरी।
पी गई मीरा विष का प्याला,
सीता ने अपमान के घूंट,
सहती आई है सदियों से,
हर स्त्री यह सब बारी बारी।
राम की सीता,कृष्ण की राधा,
मंथरा यही,कैकेयी भी यही,
विविध रंग और विविध चरित्र,
कुटिल या ,बुद्धिमान मंदोदरी।
हाथों में लिया इकतारा ,
भवन छोड़ ली भजन की राह,
बावरी मीरा ने रच डाले,
कई पद बन श्याम की चेरी।
रंभा भी यह यही उर्वशी,
शकुंतला सी भरत की जननी,
मानव जाति की आदिशक्ति यह,
और उम्मीद है ये आखरी।
तुलसी दस की हो रत्नावली,
या मार्गदर्शिका कालिदास की,
गौतम बुद्ध की यशोधरा,
प्रेरणा दायी बनी निर्मात्री।
प्रसाद की कामायनी यह,
मैथिलीशरण गुप्त की कैकेयी,
दिखने में विपरीत परन्तु,
सुख दुःख में दोनों सहयात्री।
त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं ,
देवो न जानहि कुतो मनुष्य:
सत्य सत्य अनबूझ पहेली,
हतप्रभ सरे बुद्धिधारी।
प्रभु की यह अदभुत कल्पना,
आकर्षक और मन की सुन्दर,
बुद्धि एक विशेष जो समझे,
दृष्टि अच्छी और बुरी।
कदम मिला कर चलती रहती ,
नहीं मांगती है प्रतिदान,
सहयोगी सहयात्री समझो,
ना समझो तुम अधिष्ठात्री।
आर्यावर्त के हम हैं वासी,
आर्यों के परिवार मातृ मुखी,
किन्तु आज के इस समाज में,
क्या स्थिति है नारी की सारी।
बाल्य काल में पिता भाई से,
युवा परिणिता करे पति से,
उद्धार की अपेक्षाकारी,
क्या स्त्री है अहिल्या नारी?
और यदि अहिल्यासम है,
शिलाखंड सी पड़ी हुई,
स्वनिर्णय स्वनिर्देशन बिन,
पुरुष क्वचित हैं राम रूप धारी।
मूल रूप इसका इक ही है,
लक्ष्मी रूपा सरस्वती सी,
यह दुर्गा यह चंडी भी है,
यही हमारी है गायत्री।
हरयुग में बिखरे रूप अनेक,
हर रूप है बढ़ कर एक से एक,
वीरांगना रानी झाँसी भी,
या वारांगना हो माताहारी।
मनु थी छोटी छैल छबीली,
बाल्य काल में कभी न खेली,
कभी न भाए सीधे खेल,
सदा भाई कृपाण कटारी।
अंग्रेजों को उसने ललकारा,
झाँसी देने से इन्कार ,
बराबाई से किया सामना,
थी तेजोदीप्त धनुर्धारी।
पन्ना जैसी धाय यही है,
जीजाबाई जैसी माता ,
कर्णवती सी बहन भी यही,
देवी रूपा है अवतारी।
नारी रूपा है वसुन्धरा ,
नारी रूपा मातृ भूमि ,
वीर करें प्राण न्योछावर,
रक्षा को माने सर्वोपरि।
जन्म लिया महापुरुषों ने,
अवतारों से आये संत,
मानवता की जन्मदायिनी,
वसुंधरा हम सबको प्यारी।
हरे भरे खेतों का आँचल,
गोद में नदियाँ और समंदर,
खनीज तेल भण्डार अनमोल,
रात ओढ़नी सितारों से भरी।
---------------------------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
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