विक्षोभ----------------------------
वधु रूप इसका मनभावन,
रक्ताम्बरा हाथों में मेहंदी,
नाथ टीका और मंगलसूत्र,
धारे ऊँगली में मुंदरी।
कोमल काया सुन्दर है तन,
चंचल और प्रेम प्लावित मन,
मधुरस्मिता मधुर है चितवन,
सहनशील समकक्ष धरित्री।
समझ न पाया इसे समाज,
स्त्री शक्ति का हो सम्मान,
इत उत ढूंढ़ रहा सुगंधी,
मृग बन कर अपनी कस्तूरी।
पिस कर मेहंदी,घिस कर चन्दन,
जैसे रंग और सुगंध,
वैसी ही सुख शांति आनंद,
विस्तृत करती हितकारी।
दूध का क़र्ज़,स्नेह का क़र्ज़,
इसकी सेवाओं का क़र्ज़,
क्या पुरुष कभी चुका सकता है?
यह सारी ,यह देनदारी।
पुरुष श्रेष्ठ या श्रेष्ठ है नारी?
विषय वस्तु यह नहीं है मेरी,
मेरा कहना इतना है बस,
सम समझो ना करो कमतरी।
मातृ रूपी मिटटी में जन्मे,
पालें बढ़ें,पाएं सुख साधन,
उस धरती के सदा ऋणी जो,
सहनशील और पालनहारी।
इसकी गोद में होता आरंभ ,
इसी गोद में होता अंत,
मिटटी के हम सभी खिलौने,
जाने सबकुछ बस त्रिपुरारी।
यह है जनम दायिनी माँ,
यह है स्नेह सिक्त भगिनी,
सुगढ़ और कुशल गृहिणी,
फिर भी इसका जन्म किरकिरी।
कोई नहीं मनाता खुशियाँ,
ना बजती ढोलक ना ताशा ,
फीकी सी मुस्कान से आए,
जग में श्यामा और सुंदरी।
संपन्न घरों में कुछ पलती,
करती हुयी अठखेलियाँ,
भूखे पेट कुपोषित सी भी,
जिनका जीवन गलियां संकरी।
चीथड़ों में अपने अंग छुपाती,
कोई है दुर्भाग्य शालिनी,
भिक्षा मांग रही है कोई,
हाथ में लिये कटोरी।
कभी किसी भाई की बहना,
किसी माता पिता की गहना ,
बलात्कार की बन जाए शिकार,
आत्मा तब जाए झकझोरी।
अबला तो फिर भी है अबला,
कैसा आत्म रक्षण हो अपना,
ढूंढ़ रही नित कई उपाय,
अंत हों कैसे अत्याचारी।
छुई मुई सी बन जाती है,
लक्ष्य किसी तेज़ाब की धार,
बंजारन सी करे सुरक्षा,
कर में धारण कर खुखरी।
बेटी को दे बासी रोटी,
बेटा पाए मक्खन दूध,
ब्याह करा निपटाए बेटी,
बेटा पाए महल अटारी।
फिर भी बेटी करती प्यार,
जीवन भर देती सत्कार,
बेटा दो हिस्सों में बंटता ,
बेटी की है श्रद्धा भारी।
कोई नाटक या कोई कहानी,
या कोई उपन्यास रूमानी,
नारी पात्र की अहम भूमिका,
इसके बिन हर कथा अधूरी।
देवदास की पारो यह,
यही नर्तकी चंद्रमुखी ,
वैशाली की नगर वधु भी,
रूप हैं इसके विस्मयकारी।
अमर है मजनू की लैला,
अमर महिवाल की सोहनी,
अमर विश्व इतिहास में है,
फरहाद और उसकी शीरीं।
पद्मिनी का प्राणोत्सर्ग,
अविस्मरणीय य सी गाथा है,
किन्तु नहीं सभी थीं वैसी,
समर्पित हुई जिनकी कमजोरी।
पति संग अग्नि में आहूति,
परंपरा थी प्रथा सती ,
जली कई अतीत में और,
अब भी जली रूप कुँवरी ।
पति जाते थे युद्ध क्षेत्र में,
स्त्रियाँ गेह प्रतीक्षारत,
अग्नि कुंद में आग जलाती,
अग्नि स्नान करती सहकारी।
दहेज़ वेदी पर जल जाती जब,
तब दुःख होता और मन भारी,
कई प्रश्नों के मचे बवंडर,
क्यों नारी की शत्रु नारी?
फले फूले मानव का जीवन,
चारों ओर खिले हरियाली,
वनस्पतियाँ और पशुधन,
दें नारी सैम सरिता सारी।
गंगा यमुना और सरस्वती,
धर्म पुराणों की गाथा में,
जीवनदायी निरोग दायिनी
ओर सभी पापों की तारी।
बेटी बन कर हंसी बिखेरी,
आदर्श बहू ने आन संवारी,
दो परिवारों की पूर्ण प्रतिष्ठा,
निर्भर इसपर,इसपर वारी।
नारी के बिन सूना है घर,
नारी बिन सूना परिवार,
हर समाज और हर राष्ट्र की,
बनी हुई है यह धूरि।
छोटे छोटे घर के काज,
महत्वहीन समझे समाज,
किन्तु नारी के स्पर्ष बिना ,
मच जाती है अफरा तफरी।
कर्मठ कुशल और चतुर है,
बहु आयामी है व्यक्तित्व,
कोई नहीं क्षेत्र है ऐसा,
जिसमे इसकी ना भागीदारी।
रिक्शा से इंजन चालक तक,
कर से विमान चालक तक,
अंटार्कटिका ,या अन्तरिक्ष दल,
अग्रगण्य सी बनी प्रभारी।
पढ़ लिख कर ऊँचे ओहदों पर,
अपनी शर्तों पर जीती है,
कोई पति के पीछे चलती ,
बनी हुई है गांधारी।
जीवन मरण का कष्ट भोग कर,
लाती दुनिया में संतान,
भूखी रह भी उसे पालती,
माँ गरीब और दुखियारी।
पैबंद लगी धोती पहने भी,
पूरी करे संतान की मंशा,
सपने बुनती सिर्फ उसीके,
छुपा जाती सब लाचारी।
प्रभु से मांगे कुशल क्षेम,
अपने बच्चों का सुख चैन,
अपने लिए कभी ना मांगे,
चाहे मम्मी या महतारी।
-----------------------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
वधु रूप इसका मनभावन,
रक्ताम्बरा हाथों में मेहंदी,
नाथ टीका और मंगलसूत्र,
धारे ऊँगली में मुंदरी।
कोमल काया सुन्दर है तन,
चंचल और प्रेम प्लावित मन,
मधुरस्मिता मधुर है चितवन,
सहनशील समकक्ष धरित्री।
समझ न पाया इसे समाज,
स्त्री शक्ति का हो सम्मान,
इत उत ढूंढ़ रहा सुगंधी,
मृग बन कर अपनी कस्तूरी।
पिस कर मेहंदी,घिस कर चन्दन,
जैसे रंग और सुगंध,
वैसी ही सुख शांति आनंद,
विस्तृत करती हितकारी।
दूध का क़र्ज़,स्नेह का क़र्ज़,
इसकी सेवाओं का क़र्ज़,
क्या पुरुष कभी चुका सकता है?
यह सारी ,यह देनदारी।
पुरुष श्रेष्ठ या श्रेष्ठ है नारी?
विषय वस्तु यह नहीं है मेरी,
मेरा कहना इतना है बस,
सम समझो ना करो कमतरी।
मातृ रूपी मिटटी में जन्मे,
पालें बढ़ें,पाएं सुख साधन,
उस धरती के सदा ऋणी जो,
सहनशील और पालनहारी।
इसकी गोद में होता आरंभ ,
इसी गोद में होता अंत,
मिटटी के हम सभी खिलौने,
जाने सबकुछ बस त्रिपुरारी।
यह है जनम दायिनी माँ,
यह है स्नेह सिक्त भगिनी,
सुगढ़ और कुशल गृहिणी,
फिर भी इसका जन्म किरकिरी।
कोई नहीं मनाता खुशियाँ,
ना बजती ढोलक ना ताशा ,
फीकी सी मुस्कान से आए,
जग में श्यामा और सुंदरी।
संपन्न घरों में कुछ पलती,
करती हुयी अठखेलियाँ,
भूखे पेट कुपोषित सी भी,
जिनका जीवन गलियां संकरी।
चीथड़ों में अपने अंग छुपाती,
कोई है दुर्भाग्य शालिनी,
भिक्षा मांग रही है कोई,
हाथ में लिये कटोरी।
कभी किसी भाई की बहना,
किसी माता पिता की गहना ,
बलात्कार की बन जाए शिकार,
आत्मा तब जाए झकझोरी।
अबला तो फिर भी है अबला,
कैसा आत्म रक्षण हो अपना,
ढूंढ़ रही नित कई उपाय,
अंत हों कैसे अत्याचारी।
छुई मुई सी बन जाती है,
लक्ष्य किसी तेज़ाब की धार,
बंजारन सी करे सुरक्षा,
कर में धारण कर खुखरी।
बेटी को दे बासी रोटी,
बेटा पाए मक्खन दूध,
ब्याह करा निपटाए बेटी,
बेटा पाए महल अटारी।
फिर भी बेटी करती प्यार,
जीवन भर देती सत्कार,
बेटा दो हिस्सों में बंटता ,
बेटी की है श्रद्धा भारी।
कोई नाटक या कोई कहानी,
या कोई उपन्यास रूमानी,
नारी पात्र की अहम भूमिका,
इसके बिन हर कथा अधूरी।
देवदास की पारो यह,
यही नर्तकी चंद्रमुखी ,
वैशाली की नगर वधु भी,
रूप हैं इसके विस्मयकारी।
अमर है मजनू की लैला,
अमर महिवाल की सोहनी,
अमर विश्व इतिहास में है,
फरहाद और उसकी शीरीं।
पद्मिनी का प्राणोत्सर्ग,
अविस्मरणीय य सी गाथा है,
किन्तु नहीं सभी थीं वैसी,
समर्पित हुई जिनकी कमजोरी।
पति संग अग्नि में आहूति,
परंपरा थी प्रथा सती ,
जली कई अतीत में और,
अब भी जली रूप कुँवरी ।
पति जाते थे युद्ध क्षेत्र में,
स्त्रियाँ गेह प्रतीक्षारत,
अग्नि कुंद में आग जलाती,
अग्नि स्नान करती सहकारी।
दहेज़ वेदी पर जल जाती जब,
तब दुःख होता और मन भारी,
कई प्रश्नों के मचे बवंडर,
क्यों नारी की शत्रु नारी?
फले फूले मानव का जीवन,
चारों ओर खिले हरियाली,
वनस्पतियाँ और पशुधन,
दें नारी सैम सरिता सारी।
गंगा यमुना और सरस्वती,
धर्म पुराणों की गाथा में,
जीवनदायी निरोग दायिनी
ओर सभी पापों की तारी।
बेटी बन कर हंसी बिखेरी,
आदर्श बहू ने आन संवारी,
दो परिवारों की पूर्ण प्रतिष्ठा,
निर्भर इसपर,इसपर वारी।
नारी के बिन सूना है घर,
नारी बिन सूना परिवार,
हर समाज और हर राष्ट्र की,
बनी हुई है यह धूरि।
छोटे छोटे घर के काज,
महत्वहीन समझे समाज,
किन्तु नारी के स्पर्ष बिना ,
मच जाती है अफरा तफरी।
कर्मठ कुशल और चतुर है,
बहु आयामी है व्यक्तित्व,
कोई नहीं क्षेत्र है ऐसा,
जिसमे इसकी ना भागीदारी।
रिक्शा से इंजन चालक तक,
कर से विमान चालक तक,
अंटार्कटिका ,या अन्तरिक्ष दल,
अग्रगण्य सी बनी प्रभारी।
पढ़ लिख कर ऊँचे ओहदों पर,
अपनी शर्तों पर जीती है,
कोई पति के पीछे चलती ,
बनी हुई है गांधारी।
जीवन मरण का कष्ट भोग कर,
लाती दुनिया में संतान,
भूखी रह भी उसे पालती,
माँ गरीब और दुखियारी।
पैबंद लगी धोती पहने भी,
पूरी करे संतान की मंशा,
सपने बुनती सिर्फ उसीके,
छुपा जाती सब लाचारी।
प्रभु से मांगे कुशल क्षेम,
अपने बच्चों का सुख चैन,
अपने लिए कभी ना मांगे,
चाहे मम्मी या महतारी।
-----------------------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}
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