माँ----------------------
माँ है जीवन दायीनी ऊर्जा ,
शक्ति दायिनी मातृशक्ति,
हर्ष दायिनी,स्नेह दायिनी,
प्रीती की यह अभिव्यक्ति।
मानव जीवन की यह धूरी ,
मानव की भारी संपत्ति,
मानवता का सृजन इसीसे,
अप्रतिम यह है कृति।
यह सौम्या है,शांत भाव सी,
सहनशीलता भी ममता भी,
कष्टों के कंटक चुन चुन कर,
उपवन सी यह अनुभूति।
यह स्वयं प्रेम अलौकिक रूपा,
प्रेम अनवरत बरसाती,
कुछ ना मांगे प्रेम सिवा यह,
स्वयं यही है अनुरक्ति।
यह स्फूर्ति यही जीवन गति,
करती प्रभु से यह विनती,
कल्याण सदा ही हो संतान का,
मांगे नित्य बस यही मनौती।
यह झोली फैलाए मांगे,
कल्याण ईश से अपने शिशु का,
कवच बनी यह रक्षा करती,
ममता इसकी कभी ना इति।
संतान के कल्याण के हेतु,
दे स्वेच्छाओं की सदा आहुति,
गीता पुराण और यही है श्रुति,
आओ सब मिल करें आरती।
विद्वेष विसर्जन हो जग से,
चलें सभी जन प्रेम की नीति ,
समाप्त हो विप्लव विनाश और,
बसे प्रकृति में शांति।
धरती के निरीह पशुपक्षी,
स्वतंत्र हों निर्भीक सदा ही,
कोई ना हो शत्रु उनका,
आए जग में यही जागृति।
ना हो संस्कारों की क्षति,
सबको मिले यही सुमति,
मन से सबके जाए विकृति,
सत्कर्मों को सर्व स्वीकृति।
जगमग सी यह अरुन्धती,
चारों और इसी की कीर्ति,
सरल निर्मल सी आकृति,
आओ सब मिल करें संस्तुति।
---------------------------------------------------निरंतर[कंटीन्यू]
माँ है जीवन दायीनी ऊर्जा ,
शक्ति दायिनी मातृशक्ति,
हर्ष दायिनी,स्नेह दायिनी,
प्रीती की यह अभिव्यक्ति।
मानव जीवन की यह धूरी ,
मानव की भारी संपत्ति,
मानवता का सृजन इसीसे,
अप्रतिम यह है कृति।
यह सौम्या है,शांत भाव सी,
सहनशीलता भी ममता भी,
कष्टों के कंटक चुन चुन कर,
उपवन सी यह अनुभूति।
यह स्वयं प्रेम अलौकिक रूपा,
प्रेम अनवरत बरसाती,
कुछ ना मांगे प्रेम सिवा यह,
स्वयं यही है अनुरक्ति।
यह स्फूर्ति यही जीवन गति,
करती प्रभु से यह विनती,
कल्याण सदा ही हो संतान का,
मांगे नित्य बस यही मनौती।
यह झोली फैलाए मांगे,
कल्याण ईश से अपने शिशु का,
कवच बनी यह रक्षा करती,
ममता इसकी कभी ना इति।
संतान के कल्याण के हेतु,
दे स्वेच्छाओं की सदा आहुति,
गीता पुराण और यही है श्रुति,
आओ सब मिल करें आरती।
विद्वेष विसर्जन हो जग से,
चलें सभी जन प्रेम की नीति ,
समाप्त हो विप्लव विनाश और,
बसे प्रकृति में शांति।
धरती के निरीह पशुपक्षी,
स्वतंत्र हों निर्भीक सदा ही,
कोई ना हो शत्रु उनका,
आए जग में यही जागृति।
ना हो संस्कारों की क्षति,
सबको मिले यही सुमति,
मन से सबके जाए विकृति,
सत्कर्मों को सर्व स्वीकृति।
जगमग सी यह अरुन्धती,
चारों और इसी की कीर्ति,
सरल निर्मल सी आकृति,
आओ सब मिल करें संस्तुति।
---------------------------------------------------निरंतर[कंटीन्यू]
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