विघटन-------------
सदा टूटता रहता है,
कुछ ना कुछ मन के आँगन,
सब कुछ परिवर्तित सा है,
है विस्मय कारी परिवर्तन।
परिभाषाएं बदल गई ,
देख अचंभित मन,
रिश्ते नाते मित्र पडौसी,
परिवर्तित हैं नेतागण।
पहले गहराई थी सबमे,
अब बचा रह गया उथलापन,
पहले था जीवन इन सब मे,
अब लगते हैं मरणासन्न।
पैसा ही एकमात्र लक्ष्य है,
पहले जो था केवल साधन,
इसके पीछे भाग रहे सब,
करके अपनी आँखें बंद।
तोडा ,कुचल,मिटा दिया सब,
समझ अवरुद्ध मार्ग का कारण,
कारण यही,यही निराकरण,
सब दुःखों का बना है कारण।
संबंधों की बलि चढाने,
तनिक न हिचकिच करते जन,
धन ही उनका जीवन है,
आराधन है आजीवन।
संस्कारों की तिलांजलि दी ,
मूल्यों का हो गया क्रिया कर्म,
देश भक्ति और देशप्रेम का,
कर रहे कभी से,श्राद्ध कर्म।
ममता श्रद्धा भी ओढ़ चुकी अब,
औपचारिकता का आवरण,
ढके छुपे इसके नीचे ही,
विवाह बंधन,रक्षा बंधन।
इंसानों में सीढ़ी ढूंढे,
इंसानों में ढूंढें धन ,
उपयोग करें इक दूजे का सब,
भावना विहीन खोटे मन।
सबका जीवन है शतरंज,
ख़ुशी जीत की या हार का रंज,
घाघ चतुर ही होय खिलाडी,
पिटे दीन हीन सच हरदम।
प्रेम विहीन ,स्नेह विहीन,
कभी कभी ममता विहीन,
पापी जन डर श्रद्धा करते,
वरना प्रभु को भी करते अधीन।
क्या सचमुच यह कलियुग है?
तो कब होगा कलि का अवतार?
कब सच्चाई जीत सकेगी?
पायेगा कब पापी मार ?
भौतिकता की कैसी दौड़?
खो गए सारे मूल्य अमूल्य,
लगा रहे सब अंधी दौड़,
उसके पीछे जो निर्मूल्य।
तू कहता कर्मों का भोग,
पापी क्यों रत विलास भोग,
अच्छाई क्यों खाती ठोकर,
बनी बुराई असाध्य रोग।
गर्म हीटर नर्म रजाई ,
धनपतियों को मीठी नींद,
फुट पथ पर कई गरीब,
शिशिर ऋतु में मारे ठंड।
ग्रीष्म ऋतु में गर्मी भीषण,
विकल है मानव पशु पक्षी गण ,
धन से सारे कष्ट दूर हैं,
शेष को तोड़ रही थकन।
उडती धूल पिघलती सड़कें,
स्वेद से भीगे हुए शरीर,
पशु पक्षी हों या मानव हों,
प्रयास रत कर इसे हनन।
ए सी बंगला,ए सी कार,
ए सी ट्रेन सफ़र आसान,
ठंडी बीयर आइसक्रीम,
कष्ट नहीं हो जेब में धन।
सबसे ऊपर हो गया पैसा,
चाहे उसका रंग हो जैसा,
मन में इसकी ही जोड़ तोड़,
सबसे प्यारा यह परिजन।
लक्ष्मी का महात्म्य इतना है,
सब कुछ होता क्रय विक्रय,
हर संबंध ऊँची है यह,
ध्याये जो ,हो क्षुधा शमन।
केसेट पर लक्ष्मी पूजा है,
सी डी पर गणेश वंदन,
कहाँ गए वे भक्त गण ,
जो सुबह शाम करते भजन।
सांसारिकता से परे,
ऋषी मुनियों का था एक वर्ग,
लेना देना नहीं किसी से ,
प्रभु भक्ति का था आसन।
परिवर्तित से इस समय में ,
विलुप्त पर्व आध्यात्मिकता,
विकृत सी जो दिखती हमको,
अर्थ खो चुके हैं कीर्तन।
मन में जोड़ तोड़ है कोई,
या पनप रहा कोई षड्यंत्र,
धर्म भी व्यापार बन गया,
तंत्र मन्त्र या हों प्रवचन।
किंचित मात्र दिखते हैं सात्विक,
कुछ होते पूर्ण सांसारिक,
बहुतेरे दो चेहरों वाले,
दिखते राम,होते हैं रावण ।
जैसा रुपये का आगमन,
वैसा ही होता गमन,
स्वयं पर खुल कर खर्च करें वे,
दूजों के लिए हैं अति कृपण।
पल में इच्छा पूरी होती,
फिर भी इच्छा सीमाहीन,
धनवान धन पता रहता,
तृषित मना होता निर्धन।
कोई खाता रूखी सूखी,
कोई वह भी ना पाता ,
और किसी की थाली में,
भोग परोसे हैं छप्पन।
गरीबी में जन्मा बालक,
जन्मते ही फांके धूल ,
धनि मानी के सारे किसलय,
पाले जाते बड़े जतन।
सर छुपाने को गरीब को,
झुग्गी झोंपड़ी या कुटिया ,
अट्टालिका भव्य धनी की,
या ऐश्वर्य से बंधे सदन।
------------------------------------------निरंतर[कंटीन्यू]
सदा टूटता रहता है,
कुछ ना कुछ मन के आँगन,
सब कुछ परिवर्तित सा है,
है विस्मय कारी परिवर्तन।
परिभाषाएं बदल गई ,
देख अचंभित मन,
रिश्ते नाते मित्र पडौसी,
परिवर्तित हैं नेतागण।
पहले गहराई थी सबमे,
अब बचा रह गया उथलापन,
पहले था जीवन इन सब मे,
अब लगते हैं मरणासन्न।
पैसा ही एकमात्र लक्ष्य है,
पहले जो था केवल साधन,
इसके पीछे भाग रहे सब,
करके अपनी आँखें बंद।
तोडा ,कुचल,मिटा दिया सब,
समझ अवरुद्ध मार्ग का कारण,
कारण यही,यही निराकरण,
सब दुःखों का बना है कारण।
संबंधों की बलि चढाने,
तनिक न हिचकिच करते जन,
धन ही उनका जीवन है,
आराधन है आजीवन।
संस्कारों की तिलांजलि दी ,
मूल्यों का हो गया क्रिया कर्म,
देश भक्ति और देशप्रेम का,
कर रहे कभी से,श्राद्ध कर्म।
ममता श्रद्धा भी ओढ़ चुकी अब,
औपचारिकता का आवरण,
ढके छुपे इसके नीचे ही,
विवाह बंधन,रक्षा बंधन।
इंसानों में सीढ़ी ढूंढे,
इंसानों में ढूंढें धन ,
उपयोग करें इक दूजे का सब,
भावना विहीन खोटे मन।
सबका जीवन है शतरंज,
ख़ुशी जीत की या हार का रंज,
घाघ चतुर ही होय खिलाडी,
पिटे दीन हीन सच हरदम।
प्रेम विहीन ,स्नेह विहीन,
कभी कभी ममता विहीन,
पापी जन डर श्रद्धा करते,
वरना प्रभु को भी करते अधीन।
क्या सचमुच यह कलियुग है?
तो कब होगा कलि का अवतार?
कब सच्चाई जीत सकेगी?
पायेगा कब पापी मार ?
भौतिकता की कैसी दौड़?
खो गए सारे मूल्य अमूल्य,
लगा रहे सब अंधी दौड़,
उसके पीछे जो निर्मूल्य।
तू कहता कर्मों का भोग,
पापी क्यों रत विलास भोग,
अच्छाई क्यों खाती ठोकर,
बनी बुराई असाध्य रोग।
गर्म हीटर नर्म रजाई ,
धनपतियों को मीठी नींद,
फुट पथ पर कई गरीब,
शिशिर ऋतु में मारे ठंड।
ग्रीष्म ऋतु में गर्मी भीषण,
विकल है मानव पशु पक्षी गण ,
धन से सारे कष्ट दूर हैं,
शेष को तोड़ रही थकन।
उडती धूल पिघलती सड़कें,
स्वेद से भीगे हुए शरीर,
पशु पक्षी हों या मानव हों,
प्रयास रत कर इसे हनन।
ए सी बंगला,ए सी कार,
ए सी ट्रेन सफ़र आसान,
ठंडी बीयर आइसक्रीम,
कष्ट नहीं हो जेब में धन।
सबसे ऊपर हो गया पैसा,
चाहे उसका रंग हो जैसा,
मन में इसकी ही जोड़ तोड़,
सबसे प्यारा यह परिजन।
लक्ष्मी का महात्म्य इतना है,
सब कुछ होता क्रय विक्रय,
हर संबंध ऊँची है यह,
ध्याये जो ,हो क्षुधा शमन।
केसेट पर लक्ष्मी पूजा है,
सी डी पर गणेश वंदन,
कहाँ गए वे भक्त गण ,
जो सुबह शाम करते भजन।
सांसारिकता से परे,
ऋषी मुनियों का था एक वर्ग,
लेना देना नहीं किसी से ,
प्रभु भक्ति का था आसन।
परिवर्तित से इस समय में ,
विलुप्त पर्व आध्यात्मिकता,
विकृत सी जो दिखती हमको,
अर्थ खो चुके हैं कीर्तन।
मन में जोड़ तोड़ है कोई,
या पनप रहा कोई षड्यंत्र,
धर्म भी व्यापार बन गया,
तंत्र मन्त्र या हों प्रवचन।
किंचित मात्र दिखते हैं सात्विक,
कुछ होते पूर्ण सांसारिक,
बहुतेरे दो चेहरों वाले,
दिखते राम,होते हैं रावण ।
जैसा रुपये का आगमन,
वैसा ही होता गमन,
स्वयं पर खुल कर खर्च करें वे,
दूजों के लिए हैं अति कृपण।
पल में इच्छा पूरी होती,
फिर भी इच्छा सीमाहीन,
धनवान धन पता रहता,
तृषित मना होता निर्धन।
कोई खाता रूखी सूखी,
कोई वह भी ना पाता ,
और किसी की थाली में,
भोग परोसे हैं छप्पन।
गरीबी में जन्मा बालक,
जन्मते ही फांके धूल ,
धनि मानी के सारे किसलय,
पाले जाते बड़े जतन।
सर छुपाने को गरीब को,
झुग्गी झोंपड़ी या कुटिया ,
अट्टालिका भव्य धनी की,
या ऐश्वर्य से बंधे सदन।
------------------------------------------निरंतर[कंटीन्यू]
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