हलाहल-------
स्कूल सफाई या हो बिजली,
रेल रोड या हो बस स्टॉप,
यत्र तत्र सर्वत्र बाँटते,
जेब न होती इनकी खाली।
जुबानी जमा खर्च हैं सारे,
क्या जाता है इसमें प्यारे,
कभी न पूरे होते वादे,
आश्वासन कोरे रह जाते।
चुन कर ये राजा बन जाते,
कभी न मुड कर क्षेत्र में जाते,
पांच बरस बजाते बीन,
गायब जैसे गधे के सींग।
कुर्सी को समझे गाय दुधारू,
नित्य करें ये उससे दोहन,
खाते इनके गुप्त रूप से ,
भरते हैं ढेरों संसाधन।
कई फार्म और कई जमीने,
कई प्लाट और कई मकान,
सम्प्पतियाँ कई कोठियाँ ,
सारी होती है बेनाम।
ये खाएं मुर्गी का दाना ,
ये खाएं पशुओं का चारा,
खा जाएँ गरीब का राशन,
हर खरीद पे खाएं कमीशन।
कोई बिकता है बोतल से,
कोई खाए तंदूरी मुर्ग,
नेताओं ने भेद दिया है,
इसी तरह जनतंत्र का दुर्ग।
कहीं बँट रहे नोट ही नोट,
इनके बदले मिलते वोट,
कहीं बंदूक दिखा कर गुर्गे,
बटोर लेट हैं वोट ही वोट।
कभी रेल में मुफ्त की सैर,
कभी रैली में अच्छा भोजन,
ऐसे भी होते हैं लोग,
कि जिनको समझ न आये भाषण।
-----निरंतर[कंटीन्यू]
स्कूल सफाई या हो बिजली,
रेल रोड या हो बस स्टॉप,
यत्र तत्र सर्वत्र बाँटते,
जेब न होती इनकी खाली।
जुबानी जमा खर्च हैं सारे,
क्या जाता है इसमें प्यारे,
कभी न पूरे होते वादे,
आश्वासन कोरे रह जाते।
चुन कर ये राजा बन जाते,
कभी न मुड कर क्षेत्र में जाते,
पांच बरस बजाते बीन,
गायब जैसे गधे के सींग।
कुर्सी को समझे गाय दुधारू,
नित्य करें ये उससे दोहन,
खाते इनके गुप्त रूप से ,
भरते हैं ढेरों संसाधन।
कई फार्म और कई जमीने,
कई प्लाट और कई मकान,
सम्प्पतियाँ कई कोठियाँ ,
सारी होती है बेनाम।
ये खाएं मुर्गी का दाना ,
ये खाएं पशुओं का चारा,
खा जाएँ गरीब का राशन,
हर खरीद पे खाएं कमीशन।
कोई बिकता है बोतल से,
कोई खाए तंदूरी मुर्ग,
नेताओं ने भेद दिया है,
इसी तरह जनतंत्र का दुर्ग।
कहीं बँट रहे नोट ही नोट,
इनके बदले मिलते वोट,
कहीं बंदूक दिखा कर गुर्गे,
बटोर लेट हैं वोट ही वोट।
कभी रेल में मुफ्त की सैर,
कभी रैली में अच्छा भोजन,
ऐसे भी होते हैं लोग,
कि जिनको समझ न आये भाषण।
-----निरंतर[कंटीन्यू]
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