हलाहल------
नहीं चाहते मंदिर मस्जिद,
नहीं चाहते आरक्षण,
सर्व धर्म समभाव से भरा,
देश चाहते हैं अक्षुण।
सब भूल गए की सबसे ऊपर ,
बैठा है उपरवाला,
उस लाठी में आवाज़ नहीं,
पर खाएगा खानेवाला।
झूठ फरेब स्वार्थ के नीचे,
दबा राखी है जिसने आत्मा,
एक दिन न्याय उसका,
वह प्रभु है वह परमात्मा।
उसके लिए बराबर सारे ,
ना कोई अमीर,ना कोई हकीर,
बांटे तौल के खुशियाँ और गम,
राजा रंक हो या कोई फ़कीर।
रुपये पैसे सोने चाँदी पर ,
बेच दिया जिसने ईमान,
बख्शेगा ना ऊपरवाला ,
पछतायेगा तब बेईमान।
अब भी बदलो अब भी सुधरो,
कर लो अब गुनाह से तौबा,
वैसा ही काटोगे वरना तुम ,
जैसा तुमने है बोया।
जान गए डाकू रत्नाकर,
पाप भी उनका सजा भी उनकी,
भागीदार नहीं परिवार,
पछताए तो बने वाल्मिकी।
स्वच्छ करें सब मन का दर्पण,
धूल धूसरित होता यह धन,
कालिख कितनी पुती हुई है,
करें सभी यह आत्मावलोकन।
प्रगति का तात्पर्य नहीं यह,
अपनाएं चाहे जो पथ,
झूठ फरेब और भ्रष्टाचार,
पायें सब कुछ करें कपट।
बीमार पड़े संस्कार जगाओ,
दो मृत प्राय से सत्य को जीवन,
अंधी भौतिकता की दौड़,
क्यों जीत रहे कर मूल्यों का मर्दन।
हर व्यक्ति का जीवन है,
कर्तव्यों की एक श्रंखला,
घर से भी ऊपर श्रेंणी है,
मात्रभूमि यह शस्य श्यामला।
इतने तीक्ष्ण विषैले तीर,
न बच रहा कोई तुणीर ,
भारत माता एवं आत्मा,
कराह रही सह इतनी पीर।
मानव हैं हम देव नहीं हैं,
होती रहती हमसे भूल,
किन्तु पूर्व आयोजित हो तो,
अपराध कहती ना कि भूल।
कोई क्षेत्र नहीं है ऐसा,
जिसमे स्थित न हो अपराध,
धर्म जैसा पवित्र संकाय भी,
रहा नहीं इससे आज़ाद।
सिर्फ बुराई दिखती मुझको,
यह ना सोचें पाठक वृन्द,
सुन्दर छवि मन की टूटी जब,
तभी मच मन में यह द्वंद।
बूँद बूँद कर जमा हुआ मन,
वर्षों से सिंचित हुआ हर कदम,
बहा नहीं कर के भी क्रंदन,
तब शब्दों में हुआ विष वमन।
करें आत्म चिंतन और मंथन,
कैसे उज्जवल हों मन और धन,
इस पवित्र भारत भूमि को,
करती हूँ यह काव्य समर्पण।
---------निरंतर{कंटीन्यू}
नहीं चाहते मंदिर मस्जिद,
नहीं चाहते आरक्षण,
सर्व धर्म समभाव से भरा,
देश चाहते हैं अक्षुण।
सब भूल गए की सबसे ऊपर ,
बैठा है उपरवाला,
उस लाठी में आवाज़ नहीं,
पर खाएगा खानेवाला।
झूठ फरेब स्वार्थ के नीचे,
दबा राखी है जिसने आत्मा,
एक दिन न्याय उसका,
वह प्रभु है वह परमात्मा।
उसके लिए बराबर सारे ,
ना कोई अमीर,ना कोई हकीर,
बांटे तौल के खुशियाँ और गम,
राजा रंक हो या कोई फ़कीर।
रुपये पैसे सोने चाँदी पर ,
बेच दिया जिसने ईमान,
बख्शेगा ना ऊपरवाला ,
पछतायेगा तब बेईमान।
अब भी बदलो अब भी सुधरो,
कर लो अब गुनाह से तौबा,
वैसा ही काटोगे वरना तुम ,
जैसा तुमने है बोया।
जान गए डाकू रत्नाकर,
पाप भी उनका सजा भी उनकी,
भागीदार नहीं परिवार,
पछताए तो बने वाल्मिकी।
स्वच्छ करें सब मन का दर्पण,
धूल धूसरित होता यह धन,
कालिख कितनी पुती हुई है,
करें सभी यह आत्मावलोकन।
प्रगति का तात्पर्य नहीं यह,
अपनाएं चाहे जो पथ,
झूठ फरेब और भ्रष्टाचार,
पायें सब कुछ करें कपट।
बीमार पड़े संस्कार जगाओ,
दो मृत प्राय से सत्य को जीवन,
अंधी भौतिकता की दौड़,
क्यों जीत रहे कर मूल्यों का मर्दन।
हर व्यक्ति का जीवन है,
कर्तव्यों की एक श्रंखला,
घर से भी ऊपर श्रेंणी है,
मात्रभूमि यह शस्य श्यामला।
इतने तीक्ष्ण विषैले तीर,
न बच रहा कोई तुणीर ,
भारत माता एवं आत्मा,
कराह रही सह इतनी पीर।
मानव हैं हम देव नहीं हैं,
होती रहती हमसे भूल,
किन्तु पूर्व आयोजित हो तो,
अपराध कहती ना कि भूल।
कोई क्षेत्र नहीं है ऐसा,
जिसमे स्थित न हो अपराध,
धर्म जैसा पवित्र संकाय भी,
रहा नहीं इससे आज़ाद।
सिर्फ बुराई दिखती मुझको,
यह ना सोचें पाठक वृन्द,
सुन्दर छवि मन की टूटी जब,
तभी मच मन में यह द्वंद।
बूँद बूँद कर जमा हुआ मन,
वर्षों से सिंचित हुआ हर कदम,
बहा नहीं कर के भी क्रंदन,
तब शब्दों में हुआ विष वमन।
करें आत्म चिंतन और मंथन,
कैसे उज्जवल हों मन और धन,
इस पवित्र भारत भूमि को,
करती हूँ यह काव्य समर्पण।
---------निरंतर{कंटीन्यू}
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