मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

मेरी फ़ोटो
I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

Halahal Se : By Nirupama Sinha !! Vikshobh !! {3}

विक्षोभ--------

पति बच्चों के सारे अवगुण,
इसकी दृष्टि से ओझल,
कैसा भी प्रतिदान मिले,
संतुष्टि इसने निहारी।

हर विरोध का करे सामना,
लड़ जाए दुनिया से सारी ,
बने प्रेयसी तो प्राण निछावर,
जैसे हो चंदा की चकोरी।

प्रेम में करे जीवन का अंत,
प्रेम की है यह बौछार,
प्रेमी दगाबाज़ हो तो,
भूले यह भी वफादारी।

भोलीभाली और नादान,
प्रेमी से फरेब खाकर या,
कोठे पर पहुंचा जाता है,
इसको शातिर कोई शिकारी।

यह सुमधुर है,
यह सुभाषिनी,
पर जब क्रोधित हो जाती है,
तो बन जाती है चिंगारी।

मुजरा करती कोठे पर,
या करती देह व्यापार,
स्वेच्छा शायद हो ना हो,
पा लेती है कई बीमारी।

चोरी कर ठग बन जाती,
या डाकू कोई कुख्यात,
आज सलाखों के पीछे भी है,
कई पतियों की हंतारी।

पति की मित्र रहती जीवन भर,
देती अच्छे परामर्श,
सभी स्वजनों को उबारती,
आए जब कोई दुश्वारी।

सच्ची सखी सहेली भी यह,
मर्यादा तोड़ती सौतन भी यह,
अविश्वास भरा यह भेद,
कैसा रूप धरे सहचरी।

घर भी देखे ,बच्चे पाले ,
चाहे छोटी हो कर्मचारी,
दफ्तर घर की जिम्मेदारी,
निभा रही उच्च अधिकारी।

कई आशाएं और उम्मीदें,
बाँध कलाई रक्षा बंधन,
पति के साथ करे गठ बंधन,
और सजे बनदंवारी।

शिक्षिका बन प्रेरणा देती,
आया बन करती स्नेह निसार,
डॉक्टर बन जीवन भी देती,
करे नर्स बन तीमारदारी।

बसों में दफ्तरों में शोषण,
घरों में परिवारों में शोषण,
देवी लक्ष्मी बन कर शोषण,
हाय ये है कैसी मजबूरी।

सास यही और यही बहु है,
ननद यही यही है भाभी,
क्लेष मच परिवार तोडती,
कभी जोड़ती मधुर गनेरी।

भ्रष्टाचारों की सूचि में,
कम ही है इसका उल्लेख,
इक्का दुक्का आरोपित,
शेष धरे ईमानदारी।

राजनीति में युगों युगों से,
सर्वश्रेष्ठ रही स्वयं सिद्धा ,
किन्तु उपेक्षा हुई इसीकी,
जब हुई स्वार्थी ,अहंकारी।

जब इसने संस्कार छोड़ कर,
संस्कृति की परंपरा तोड़ कर,
किया अस्मिता का हनन,
तब तब वह गई धिक्कारी।

स्वयं सुरक्षा सबसे ऊपर ,
उसके बाद इसका परिवार,
प्राणों से भी प्यारी इसको,
अपने घर की फुलवारी।

लेखिका हो या हो कवियत्री,
चित्रकार या हो अभिनेत्री,
अभिव्यक्ति जब जग जाहिर हो,
गूंज उठे सारी बारादरी।

युगों युगों से छली गई,
रोंदी गई बहुतायत से ,
फिर भी निभा रही वर्षों से,
यह दुनिया की दुनिया दारी।

प्रवचन करती धर्म के,
देती है व्याख्यान कहीं,
दिखती किसी साधु टोली में,
या साध्वी कोई संग अघोरी।

------------------------------निरंतर{कंटीन्यू}

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Dharavahik crime thriller ( 229)Apradh !!

Sanjay Sharma and Sunita Sharma couldn’t understand what happened and why ? Why suddenly this storm came in their life. They quickly had hav...

Grandma Stories Detective Dora},Dharm & Darshan,Today's Tip !!