उत्खनन--------
विश्व पुरातन पांच सभ्यताओं
में से एक है एक भारत देश,
आर्यों का आर्यावर्त कहलो ,
या वीर भरत का एक सन्देश।
तैमूर बख्तियार खिलजी या,
रक्त पिपासु चंगेजखान,
लुटा बहुत और मिटा कई बार,
जान से प्यारा हिन्दुस्तान।
मारकाट भी मची बहुत,
बोली गयी रक्त की भाषा,
गजनी गौरी की लूट पाट भी,
मिटा सकी ना देश की आशा।
काल सल्तनत हो या मुग़ल,
अत्याचारों का थमा न दौर,
धर्म संस्कृति परम्पराएँ,
टूट सकी ना किसी भी तौर।
वेधशालाएं और ग्रंथालय,
मंदिर और कई महा विद्यालय,
महान ग्रन्थ और वेद पुराण,
जल कर बन गए भस्म सामान।
नालंदा और विक्रमशिला में,
ज्ञान दान था तक्षशिला में,
होम हो गए अग्नि में वे ,
खंडहर बन कर रह गए सारे।
धर्म और संस्कृति पर था,
कुटिल,कठोर,कुठाराघात,
किन्तु मिटे ना मिट पाएंगे,
झेल गए हम सब संघात।
आये थे करने अंग्रेज,
कारोबार और व्यापार,
बूझ सोने की चिड़िया इसको,
बन गए इसके ठेकेदार।
छोटे छोटे टुकड़ों में था,
बंटा हुआ सा भारत देश,
फूट डाल कर और भी बांटा,
छा गए वे सब,सारे देश।
तत्कालीन राजा नवाब सब,
एक से बढ़ कर एक ऐयाश,
नाच रंग में डूबे रहना,
समय का धन का करते नाश।
अंग्रेजों ने फेंका दाना,
ढोंग सुरक्षा का था वादा,
झपटते रहे कहीं पे पूरा,
राज्य कहीं से आधा आधा।
फिरंगी ने लहराया परचम,
यह था चतुर चालाक विशेष,
नब्ज़ पकड़ कर समझ गया वह,
कैसे टूटेगा यह देश।
राजाओं नवाबों के भय,
कायरता और लोभ के नाम,
ऐय्याशी और लालच की लय ,
भारत बन गया एक गुलाम।
अत्याचार सहे हमने कई,
व्यभिचार और दुराचार,
अनाचार भी उस शासन के,
कैसे सह गए,करें विचार।
अत्याचार बढे जनता पर ,
स्वाभिमान ने ताना सर,
वर्षों चला था एक संग्राम,
भागे तब,पग सर पर रख कर।
आज़ादी के महा यज्ञ में,
जाने माने और अनजाने,
अगणित वीर और दीवाने,
बन गए शोलों के परवाने।
बेटे कई माताओं के,
या बहनों के प्यारे भाई,
सुहाग कई सुहागिनों के,
प्राण दे गए,कर निठुराई।
देश के कोने कोने से,
उठ रही थी एक आवाज,
भारत छोड़ो,भारत छोड़ो,
छोड़ो अब ये तख़्त और ताज।
इस आन्दोलन का नेतृत्व,
कर रहा था एक व्यक्तिव,
हाथ में लाठी,आधी धोती,
दृढ निश्चयी और कृषगात।
मोहनदास करम चंद गाँधी,
बन कर छाये थे एक आंधी,
अहिंसा था उनका हथियार,
हतप्रभ थी गोरी सरकार।
कभी आन्दोलन,कभी सत्याग्रह,
कभी यह विरोध,कभी वह विरोध,
अनुशासन युत मार्गदर्शन का,
मिला सभी को एक नेतृत्व।
महात्मा या महान आत्मा,
पिता राष्ट्र के,या राष्ट्रपिता,
त्यागमय जीवन और बलिदान,
दिया आज़ादी का वरदान।
गोरों ने बोया जाते जाते,
सम्प्रदायों में फूट का बीज,
इसके हुए परिणाम भयंकर,
दंगे फैले मचा बवंडर।
हिंसा फैली चारों ओर,
मारकाट फैली चहुँ ओर ,
लुटे,कटे,बिछड़े कितने ही,
कई इस और,कई उस ओर .
दो टुकडों में बँट गया देश,
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान,
दोनों में बन गयी सरकार,
गया नहीं मन का विद्वेष।
आज़ादी की बही बयार,
चारों ओर मने त्यौहार,
हर्षित हुए प्रफ्फुलित सारे ,
देश अपना अपनी सरकार।
अहिंसा का पुजारी था मौन,
दुःख था तीव्र हर्ष था गौण,
कल तक एक जुट थे सारे,
आज बने दो अलग किनारे।
देश विभाजन इतनी हिंसा,
हुई न पूरी सबकी मंशा,
गांधीजी के इस निर्णय से,
कई रुष्ट थे कई असंतुष्ट।
30 जनवरी का दुर्दिन था,
प्रार्थना सभा में ऊषा काल,
तीन गोलियां लगी ह्रदय पर,
समां गए वे काल के गाल।
गोली लगी गिरे धरती पर,
मुंह से निकला था"हे राम"
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने,
त्याग दिए धरती पर प्राण।
निरंतर-----------{कंटीन्यू}
विश्व पुरातन पांच सभ्यताओं
में से एक है एक भारत देश,
आर्यों का आर्यावर्त कहलो ,
या वीर भरत का एक सन्देश।
तैमूर बख्तियार खिलजी या,
रक्त पिपासु चंगेजखान,
लुटा बहुत और मिटा कई बार,
जान से प्यारा हिन्दुस्तान।
मारकाट भी मची बहुत,
बोली गयी रक्त की भाषा,
गजनी गौरी की लूट पाट भी,
मिटा सकी ना देश की आशा।
काल सल्तनत हो या मुग़ल,
अत्याचारों का थमा न दौर,
धर्म संस्कृति परम्पराएँ,
टूट सकी ना किसी भी तौर।
वेधशालाएं और ग्रंथालय,
मंदिर और कई महा विद्यालय,
महान ग्रन्थ और वेद पुराण,
जल कर बन गए भस्म सामान।
नालंदा और विक्रमशिला में,
ज्ञान दान था तक्षशिला में,
होम हो गए अग्नि में वे ,
खंडहर बन कर रह गए सारे।
धर्म और संस्कृति पर था,
कुटिल,कठोर,कुठाराघात,
किन्तु मिटे ना मिट पाएंगे,
झेल गए हम सब संघात।
आये थे करने अंग्रेज,
कारोबार और व्यापार,
बूझ सोने की चिड़िया इसको,
बन गए इसके ठेकेदार।
छोटे छोटे टुकड़ों में था,
बंटा हुआ सा भारत देश,
फूट डाल कर और भी बांटा,
छा गए वे सब,सारे देश।
तत्कालीन राजा नवाब सब,
एक से बढ़ कर एक ऐयाश,
नाच रंग में डूबे रहना,
समय का धन का करते नाश।
अंग्रेजों ने फेंका दाना,
ढोंग सुरक्षा का था वादा,
झपटते रहे कहीं पे पूरा,
राज्य कहीं से आधा आधा।
फिरंगी ने लहराया परचम,
यह था चतुर चालाक विशेष,
नब्ज़ पकड़ कर समझ गया वह,
कैसे टूटेगा यह देश।
राजाओं नवाबों के भय,
कायरता और लोभ के नाम,
ऐय्याशी और लालच की लय ,
भारत बन गया एक गुलाम।
अत्याचार सहे हमने कई,
व्यभिचार और दुराचार,
अनाचार भी उस शासन के,
कैसे सह गए,करें विचार।
अत्याचार बढे जनता पर ,
स्वाभिमान ने ताना सर,
वर्षों चला था एक संग्राम,
भागे तब,पग सर पर रख कर।
आज़ादी के महा यज्ञ में,
जाने माने और अनजाने,
अगणित वीर और दीवाने,
बन गए शोलों के परवाने।
बेटे कई माताओं के,
या बहनों के प्यारे भाई,
सुहाग कई सुहागिनों के,
प्राण दे गए,कर निठुराई।
देश के कोने कोने से,
उठ रही थी एक आवाज,
भारत छोड़ो,भारत छोड़ो,
छोड़ो अब ये तख़्त और ताज।
इस आन्दोलन का नेतृत्व,
कर रहा था एक व्यक्तिव,
हाथ में लाठी,आधी धोती,
दृढ निश्चयी और कृषगात।
मोहनदास करम चंद गाँधी,
बन कर छाये थे एक आंधी,
अहिंसा था उनका हथियार,
हतप्रभ थी गोरी सरकार।
कभी आन्दोलन,कभी सत्याग्रह,
कभी यह विरोध,कभी वह विरोध,
अनुशासन युत मार्गदर्शन का,
मिला सभी को एक नेतृत्व।
महात्मा या महान आत्मा,
पिता राष्ट्र के,या राष्ट्रपिता,
त्यागमय जीवन और बलिदान,
दिया आज़ादी का वरदान।
गोरों ने बोया जाते जाते,
सम्प्रदायों में फूट का बीज,
इसके हुए परिणाम भयंकर,
दंगे फैले मचा बवंडर।
हिंसा फैली चारों ओर,
मारकाट फैली चहुँ ओर ,
लुटे,कटे,बिछड़े कितने ही,
कई इस और,कई उस ओर .
दो टुकडों में बँट गया देश,
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान,
दोनों में बन गयी सरकार,
गया नहीं मन का विद्वेष।
आज़ादी की बही बयार,
चारों ओर मने त्यौहार,
हर्षित हुए प्रफ्फुलित सारे ,
देश अपना अपनी सरकार।
अहिंसा का पुजारी था मौन,
दुःख था तीव्र हर्ष था गौण,
कल तक एक जुट थे सारे,
आज बने दो अलग किनारे।
देश विभाजन इतनी हिंसा,
हुई न पूरी सबकी मंशा,
गांधीजी के इस निर्णय से,
कई रुष्ट थे कई असंतुष्ट।
30 जनवरी का दुर्दिन था,
प्रार्थना सभा में ऊषा काल,
तीन गोलियां लगी ह्रदय पर,
समां गए वे काल के गाल।
गोली लगी गिरे धरती पर,
मुंह से निकला था"हे राम"
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने,
त्याग दिए धरती पर प्राण।
निरंतर-----------{कंटीन्यू}
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